यायावरी yayavaree: गणतंत्र दिवस का अर्थ और 68वां गणतंत्र दिवस समारोह

Friday, 27 January 2017

गणतंत्र दिवस का अर्थ और 68वां गणतंत्र दिवस समारोह

दिन था 26 जनवरी, 1950, जगह थी गवर्नमेंट हाउस का दरबार हॉल और वक्‍़त था सुबह के 10 बजकर 18 मिनट. ठीक इसी क्षण भारत ने एक गणराज्‍य के रूप में जन्‍म लिया था और ये क्षण भारत के इतिहास का सबसे गौरवमयी क्षण था. संविधान सभा 26 जनवरी, 1949 को देश के लिए नए संविधान को स्‍वीकार कर चुकी थी और 26 जनवरी, 1950 को इस संविधान के लागू होते ही भारत के स्‍वतंत्र और संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्‍य में परिवर्तित होने की प्रकिया पूरी हो गई. तकरीबन 10.30 बजे 31 बंदूकों की सलामी से भारत के पहले राष्‍ट्रपति की घोषणा भी हो गई. दरबार हॉल में एक सादगी भरे समारोह में श्री राजेन्‍द्र प्रसाद ने राष्‍ट्रपति पद की शपथ ली और इसके बाद पहले राष्‍ट्रपति श्री राजेन्‍द्र प्रसाद बग्घी में सवार होकर इरविन स्‍टेडियम के लिए निकले जिन्‍हें देखने के लिए पांच मील तक लोगों का हुजूम सड़कों पर जमा था. राष्‍ट्रपति महोदय ने इरविन स्‍टेडियम में झंडा फहरा कर सलामी ली. आज 68 वर्षों बाद भी गणतंत्र के उत्‍सव का ये सिलसिला पूरी गरिमा और भव्‍यता के साथ बदस्‍तूर जारी है. आज भी देश की जनता उसी उत्‍साह और भावनाओं के ज्‍वार के साथ दुनिया की इस सबसे भव्‍य गणतंत्र दिवस परेड़ को देखने आती है। ऐसे अनूठे आयोजन की पूरी दुनिया में कहीं कोई मिसाल नहीं.

मैं पिछले कई वर्षों से गणतंत्र दिवस परेड़ का साक्षी बनता रहा हूं. बचपन से ये परेड़ टीवी पर देखता आया हूं मगर राजपथ पर बैठकर अपनी आंखों से इसे देखना एक अद्भुत अनुभव है. इस अनुभव को सिर्फ वहीं बैठकर महसूस किया जा सकता है. मुझे लगता है कि देश के हर नागरिक को अपने जीवन में कम से कम एक बार तो इस परेड़ को राजपथ पर देखना चाहिए. हमें अपने बच्‍चों को भी ये परेड़ दिखानी चाहिए. केवल दिखानी ही नहीं उन्‍हें देश की स्‍वतंत्रता के इतिहास और देश पर अपनी जान न्‍यौछावर कर देने वाले वीर जवानों के बारे में भी बताना चाहिए. कम से कम एक माता-पिता के रूप में हम अपने बच्‍चों को स्‍वतंत्र देश के नागरिक होने का महत्‍व तो समझा पाएं. स्‍वतंत्रता अमूल्‍य अहसास है. हमारे देश ने बरसों तक गुलामी को भोगा है...हमसे बेहतर स्‍वतंत्रता का मूल्‍य और कौन समझ सकता है. 

ये सच है कि हमारा गणतंत्र अभी उतना परिपक्‍व नहीं हुआ है जितना इसे होना चाहिए. आज भी तंत्र के बीच गण कहीं अपनी जगह तलाशता नज़र आता है. मगर इतना अवश्‍य है कि हम निरंतर प्रगति के पथ पर आगे बढ़ रहे हैं. हमारे विकास के साथ-साथ हमारे विचार भी प्रगति कर रहे हैं और एक प्रगतिशील राष्‍ट्र के लिए भौतिक विकास से कहीं ज्‍यादा जरूरी वैचारिक प्रगति है. आज कितनी भी चरमपंथी और मजहबी ताकतें देश को बांटने का प्रयास कर रही हों, देश में आज भी इससे प्रेम करने वाले लोग पूरी निष्‍ठा के साथ इसके ताने-बाने को बनाए रखने के लिए प्रयासरत हैं और देश की सीमाओ के प्रहरी अपने प्राणों की आहुति देकर भी इसकी सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं।


इस सब के बीच एक बात मुझे अक्‍सर हैरत में डालती रही है. हर वर्ष इतनेे जोर-शोर से मनाए जाने के बावजूद देश की आम जनता में गणतंत्र दिवस और स्‍वतंत्रता दिवस को लेकर बहुत से भ्रम हैं. बहुत से लोग ये ही नहीं जानते कि हम 26 जनवरी क्‍यों मनाते हैं. इनमें अच्‍छे भले और पढ़े-लिखे लोगों की संख्‍या भी कम नहीं है. दोष हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था को दें या घर परिवार में माता-पिता से मिलने वाली शिक्षा को या फिर देश के सामाजिक माहौल को जिसमें अक्‍सर लोग स्‍वतंत्रता की कीमत भूलते नज़र आते हैं. कम लोग ही जानते हैं कि गणतंत्र दिवस 26 जनवरी को मनाने की एक खास वजह ये भी थी कि 1930 में इसी दिन भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस द्वारा ब्रिटिश सरकार के डोमिनियन स्‍टेटस के प्रस्‍ताव के विरोध में पूर्ण स्‍वाधीनता के प्रस्‍ताव को पारित किया था। गणतंत्र दिवस को लेकर लोगों में होने वाली गलतफ़हमियों में और भी कई चीजें शामिल हैं. मसलन बहुत से लोगों को लगता है कि 26 जनवरी को प्रधानमंत्री भाषण देते हैं. कुछ लोगों को लगता है कि राजपथ पर परेड़ 26 जनवरी के बजाए 15 अगस्‍त को निकलती है. मगर एक बात है. बेशक लोगों को इन दोनों राष्‍ट्रीय पर्वों की पेचीदगियों की जानकारी न हो मगर इन उत्‍सवों पर वे एक स्‍वतंत्र राष्‍ट्र के नागरिक के नाते अपने वतन के प्रति अपने प्रेम और देशभक्ति का इज़हार करना चाहते हैं.

हर बार की तरह इस बार की परेड़ भी भव्‍य और देश की सांस्‍कृतिक विविधता से भरी हुई थी. इस बार मैं प्रेस एन्‍क्‍लोज़र की अग्रिम पंक्तियों से इस परेड़ को देख रहा था. मेरे साथ Travel Correspondents and Bloggers Group के साथी मौजदू थे. कुछ पहली बार ये परेड़ देख रहे थे तो कुछ पहले भी कई मर्तबा इस अनूठे आयोजन का अनुभव ले चुके थे. इस बार के मुख्‍य अतिथि आबू धाबी के युवराज शेख मौहम्‍मद बिल ज़ायेद अल नाहयान थे. सउदी अरब के साथ भारत के पुराने संबंध रहे हैं. यूं भी, आज के अंतर्राष्‍ट्रीय परिदृश्‍य में मिडिल ईस्‍ट में हमें पुराने मित्रों से दोस्‍ती को और गहरी करने और नए मित्र बनाने की जरूरत है. युवराज का ये दौरा निस्‍संदेह भारत और यूएई के संबंधों में नई ताज़गी लेकर आएगा. 
 
राजपथ पर हर शख्‍़स की निगाहें प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी को ढूंढ रही थीं. कुछ देर में हमारे ठीक सामने श्री मोदी अपनी कार से उतरे तो राजपथ पर बैठे जन-समूह में एक हिलोर से उठ गई. तमाम चाहने वालों के चेहरे चमक उठे. अपने ड्रेस सेंस के लिए विख्‍यात प्रधानमंत्री इस बार गुलाबी साफे और बूंदीदार नीले वेस्‍ट कोट और सफ़ेद कुर्ते में सबसे अलग नज़र आ रहे थे.


हर वर्ष की तरह इस बार भी परेड़ में सशस्‍त्र सेनाओं के बैंड, दस्‍ते, सेवानिवृत्‍त सैन्‍य अधिकारी, बहादुर बच्‍चे, विभिन्‍न राज्‍यों की सांस्‍कृतिक विविधता को दर्शाती मनमोहक झांकियां, मोटर साइकिलों पर करतब दिखाते जवान, आसमान का सीना चीर कर फ्लाई-पास्‍ट करते वायु सेना के हैलीकॉप्‍टर, मिग, जगुआर, सुखोई और तमाम अन्‍य विमान. हां इस बार, एनएसजी कमांडो का दस्‍ता और तेजस विमान सबसे आकर्षण का प्रमुख केन्‍द्र थे. ऐसा बहुत कुछ था जिसे शब्‍दों के बजाए तस्‍वीरों से समझा जा सकता है. पूरी कहानी अब तस्‍वीरों की जुबानी.


















          सभी तस्‍वीरें रक्षा मंत्रालय के पीआर डिवीजन द्वारा उपलब्‍ध कराई गई हैं...उनका बहुत आभार.
#tcbg #tcbg_trips #Rdparade #Republicday #68threpublicday #rajpath #newdelhi

No comments:

Post a Comment