यायावरी yayavaree: 2017

Monday, 21 August 2017

अहंकार को मसालेदार ललकार है वीआईपी-2

फिल्‍म का एक दृश्‍य है जिसमें एक छोटी सी कंस्‍ट्रक्‍शन कंपनी में काम करने वाला नायक रघुवरन (धनुष) देश की सबसे बड़ी कंस्‍ट्रक्‍शन कंपनी की नौकरी के दिलकश ऑफर को ठुकराते हुए कहता है कि ‘मैं शेर की दुम बनने से ज्‍यादा बिल्‍ली का सिर बनना पसंद करूंगा। ये अकेला दृश्‍य फिल्‍म की कहानी के नीचे बह रहे अंडर करंट को परिभाषित करने के लिए काफी है। यहां अहंकार और बदमिजाजी का सामना ख़ुद्दारी और क़ाबिलियत से हो रहा है। नतीजा सभी जानते हैं... नायक की जीत तय है। मगर एक दर्शक के लिए यह देखना महत्‍पूर्ण है कि कहानी किन गलियों और नुक्‍कड़ों से होकर अपने अंत तक पहुंचेगी?

तमिल फिल्‍म ‘वीआईपी’ का सीक्‍वल है ‘वीआईपी-2’ जो हिन्‍दी में ‘वीआईपी-2 ललकार’ नाम से डब होकर आई है। फिल्‍म का नायक बेहद योग्‍य इंजीनियर है जिसकी सबसे बड़ी दौलत उसकी क़ाबिलियत और उस पर भरोसा करने वाले हज़ार इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स हैं। इन्‍हीं इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स के सहारे रघुवरन का सपना है अपनी कंपनी खड़ी करने का। एक छोटी सी कंपनी में इंजीनियरिंग की नौकरी करने वाले रघुवरन की कंस्‍ट्रक्‍शन की दुनिया की बेताज बादशाह वसुंधरा से ठन जाती है। सो रघुवरन के रास्‍ते में भी हज़ार चुनौतियां हैं। हालात कितने भी बदतर क्‍यों न हों... लेकिन रघुवरन बार-बार गिर कर भी खड़ा होता है। हर हालत में नायक सही और गलत में से सही रास्‍ते को ही पकड़ता है फिर चाहे इसकी कीमत मिट्टी में मिल जाना ही क्‍यों न हो। यही अंदाज़ रघुवरन को नायक बनाता है और फिर यहां तो नायक दक्षिण भारतीय फिल्‍म का है सो उससे उस सब की अपेक्षा भी की जाती है जो एक उत्‍तर भारतीय फिल्‍म के नायक के लिए लगभग असंभव हो। मसलन एक दुबला पतला छरहरा बदनगले में टाई बांधकर कम्‍प्‍यूटर पर काम करने वाला बाबूजी टाइप सिविल इंजीनियर जरूरत पड़ने पर अपने से तीन गुना भारी और भयंकर गुंडों को ताश के पत्‍तों की तरह हवा में उड़ा रहा है। एक पल को तो लगता है कि बॉसकुछ ज्‍यादा हो गया। पर अगले ही पल ख्‍याल आता है कि जैसे धनुष के कंधों पर शायद ग्रेट रजनीकांत की विरासत को संभालने की जिम्‍मेदारी आन पड़ी हो। यूं भी साउथ की फिल्‍में बिना मार-धाड़टशनबाजी और धूम-धड़ाके के पूरी हो ही नहीं सकतीं। तिस पर भी यह फिल्‍म मसालेदार मिक्‍स वेज की तरह तैयार की गई है। धनुष से जबरन डांसगाना और कॉमेडी कराई गई है। मगर कुछ है जो तमाम कमियों के बावजूद हमें बांधे रखता है।

एक दर्शक के तौर पर मेरी दिलचस्‍पी इस बात में है कि बार-बार तबाह होने वाला रघुवरन फीनिक्‍स की तरह कैसे अपनी ही राख से उठ खड़ा होगायूं तो इस तरह की कहानियां भारतीय सिनेमा में सैकड़ों फिल्‍मों में आजमाई जा चुकी हैं लेकिन यहां ट्रीटमेंट थोड़ा अलग है। अपने कमजोर पलों में भी नायक को सिम्पथी की जरूरत नहीं है बल्कि जीरो पर आ जाने के बाद उसमें ग़ज़ब की ताकत नज़र आने लगती है क्‍योंकि अब उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है। यही इसके नायक की यूएसपी है। धनुष बार-बार अपने ससुर रजनीकांत के स्टाइल की याद दिलाते हैं।

फिल्‍म में कई जगह सौंदर्या रजनीकांत का निर्देशन और धनुष की कहानी, दोनों लड़खड़ाते नज़र आते हैं। देश की सबसे बड़ी कंपनी की मालकिन वसुंधरा को बराबरी की टक्‍कर देने वाला रघुवरन हर रात अव्‍वल दर्जे के शराबियों की तरह पी कर घर लौटता है। फिर मियां-बीबी का रोज का वही घिसा-पिटा नाटक। बीवियों के नाम पर वही पुराने घिसे-पिटे चुटकुले। पूरी फिल्‍म को धनुष अपने कंधे पर उठा कर अंत तक ले गए हैं मगर वह दूसरों के कमजोर कंधों की जिम्‍मेदारी तो नहीं उठा सकते न?फिल्‍म का एक भी गीत याद रखने लायक नहीं है। फिल्‍म का अंत जरूरत से ज्‍यादा नौटंकी भरा है।

यह क्‍लास की नहीं बल्कि मास की फिल्‍म है। इसलिए यदि हॉल में नायक की टशनभरी स्‍टाइल देख कर ताली पीटना अच्‍छा लगता हो तो जरूर जाएं। बीच-बीच में कुछ धारदार डायलॉग भी तालियों की चाह में ही पिरोए गए लगते हैं और उन पर ताली बनती भी है। बेहतरीन डबिंग और काजोल की मौजूदगी से पता ही नहीं चलता कि ये कोई हिन्‍दी फिल्‍म न होकर तमिल फिल्‍म है। और हांफिल्‍म के अंतिम दृश्‍य में अपने संवाद ‘अब देखना मैं आगे-आगे क्‍या करता हूं’ के साथ धनुष ‘वीआईपी-3की भी गुंजाइश छोड़ गए हैं।


फिल्‍म वीआईपी-2 का यह रिव्‍यू मूल रूप से चर्चित  फिल्‍म पत्रकार और समीक्षक दीपक दुआ जी की वेबसाइट सिनेयात्रा के लिए लिखा गया था जो वहां 19 अगस्‍त को प्रकाशित हुआ है। उसी लेख को यहां यायावरी के पाठकों के लिए प्रकाशित किया गया है। 

Wednesday, 31 May 2017

Tirthan Valley: A Hidden Paradise in Himachal- Part 2

तीर्थन वैली: 
सफ़र एक सपनों की दुनिया का- भाग दो

दोस्‍तो, पिछली पोस्‍ट में आपने दिल्‍ली से तीर्थन वैली और फिर जालोरी-पास तक के सफ़र की कहानी पढ़ी. जो पिछली पोस्‍ट नहीं पढ़ पाए वे पहले Tirthan Valley: A Hidden Paradise in Himachal पढ़ें क्‍योंकि कहानी तो शुरू से सुनी जाती है. है ना?

तो आगे का किस्‍सा ये है कि जालोरी पास पर स्‍नो-फॉल के उस जादुई मंजर को अपने दिल में कैद कर हमारा काफिला वापिस एंगलर्स रिट्रीट की उसी छुपी-ढ़की दुनिया में लौट आया. हम एक बार फिर इंटरनेट और मोबाइल सिग्‍नल के दायरों से बाहर और बहुत दूर थे. इंटरनेट से दूर रहने की आदत नहीं थी सो पहले दिन बहुत अजीब लगा. हाथ बार-बार मोबाइल की स्‍क्रीन पर चला जाता मगर स्‍क्रीन में ऊपर सिग्‍नल-बार को नदारद पाकर मायूस होकर लौट आता. बार-बार लगता कि जैसे कोई मैसेज आया हो, किसी ने कुछ कहा हो या कुछ देखने-पढ़ने लायक भेजा हो. पूरा एक दिन लगा इस बेचैनी को दूर करने में. मगर एक बार जब ये बेचैनी दूर हो गई तो लगने लगा कि इंटरनेट की ये पुडि़या असल में है फालतू ही. अब हम जिस दुनिया में थे वहां वास्‍तव में इस सबकी कोई जरूरत नहीं थी. हम आए भी तो सुकून की तलाश में ही थे. कभी-कभी हमें इस बीमारी से दूर रहना भी चाहिए. सो इस वक्‍़त मोबाइल केवल एक कैमरे का काम कर रहा था.

जालोरी और खनाग तक की यात्रा में कुछ थकान भी हड्डियों में उतर आई थी. जिसे रिसॉर्ट की गर्म अदरक वाली चाय ने हल्‍का कर दिया. इसके बाद शुरू हुआ रात में बोन-फायर का दौर जो देर रात तक घुमक्‍कड़ों के किस्‍सों के साथ चलता रहा. ये रिसॉर्ट में हमारी आखिरी रात थी और अगले दिन सुबह वापिस उसी आपाधापी भरी सभ्‍यता की ओर लौटना था. यहां आते समय जिस गति से पांडे जी हमें लेकर आए उससे तय था कि यदि सुबह आठ-नौ बजे निकले तो आधी रात में दिल्‍ली में प्रवेश करेंगे और फिर रात 2-3 बजे के आस-पास दिल्‍ली में कहां भटकते? सो तय किया कि प्रस्‍थान अब आराम से किया जाएगा. इससे कुछ और घंटे हमें तीर्थन में मिल गए.



मगर तीर्थन छोड़ने से पहले इस यात्रा का एक अनूठा सोपान अभी बाकी था. एक शाम पहले चाय पर फ्रांस से आई हुई पॉलिन कैस से मुलाक़ात हुई. पॉलिन फ्रांस में योगा की स्‍टूडेंट हैं और यहां वर्कअवे साइट के जरिए आई हुई हैं. वर्कअवे दरअसल दुनिया भर के उत्‍साही लोगों को दुनिया में किसी जगह जाकर अपना मनपसंद काम करने और बदले में वहां रहने और खान-पान की मुफ्त व्‍यवस्‍था में होस्‍ट और वॉलंटियर के बीच मध्‍यस्‍थ की भूमिका निभाती है. आपके पास कोई खास हुनर हो या आप कोई काम जानते हों तो इस साइट पर वॉलंटियर करने के लिए रजिस्‍टर कर दीजिए फिर जिसे जरूरत होगी...आपको होस्‍ट कर देगा. आप किसी ग़रीब देश में बच्‍चों को पढ़ा सकते हैं, कंस्‍ट्रक्‍शन में मदद कर सकते हैं, किसी परिवार के साथ रह कर उनके बच्‍चों को गिटार सिखा सकते हैं, कोई नई भाषा सिखा सकते हैं, किसी ऑफ-बीट लोकेशन पर किसी छोटे रिसॉर्ट या रेस्‍तरां में कुकिंग कर सकते हैं, कुल मिलाकर आप जो कुछ जानते हैं उसकी कहीं न कहीं दरकार जरूर होगी...इसी तरह पॉलिन यहां योगा सिखा रही थीं. ये एक तरह का सांस्‍कृतिक आदान-प्रदान है. ये खेल समझ आया तो मैं सोचने लगा कि एक दिन मौका लगा तो जरूर कहीं वर्कअवे के सहारे ही निकल पडूंगा. अंग्रेजी-हिन्‍दी दोनों पढ़ा सकता हूं, थोड़ी बहुत कैरियर काउंसलिंग भी कर सकता हूं, स्‍कूल-कॉलेज में पब्लिक स्‍पीकिंग के कारगर गुर सिखा सकता हूं. खैर फिलहाल पॉलिन ने योगा सीखने के लिए आमंत्रित किया तो झट से हां कह दी. योगा के लिए सुबह 7 बजे का वक्‍़त तय किया गया. ये बात बाद में पता चली कि अल्‍का जी और पुनीत जी को इस व्‍यवस्‍था का पहले से पता था मगर इसे सरप्राइज के तौर पर सीक्रेट रखा गया था.


PC: दो घुमक्‍कड़

PC: Alka Kaushik
पॉलिन ध्‍यान की मुद्रा मेें
तस्‍वीर: तीर्थन एंंगलर्स रिट्रीट
अगले दिन सुबह ठीक 7 बजे मैं बाहर मैदान में था. आस-पास खामोशी और पलाचन के शोर के सिवाय कुछ नहीं था. जो साथी रात को योगा का वायदा करके गए थे शायद अभी नींद के आगोश में थे. तभी पॉलिन को पास के एक घर से साजो-सामान के साथ रिसॉर्ट की ओर आते देखा. इस वक्‍़त वैली मौसम का एक और ही रंग दिखा रही थी. जो इलाका पिछले दो दिन से बादलों और बारिश के खेल में डूबा था आज वो सुनहरी धूप में चमक रहा था. सूर्यदेव पहाड़ी के ऊपर आसमान में पूरे तेज के साथ मुस्‍कुरा रहे थे. इस वक्‍़त हवा की ताजगी को मापने का कोई पैमाना होता तो शायद टूट ही जाता. पॉलिन अपने साथ नए योगा मैट्स लेकर आई थीं. योगा करने वालों ने अपने कपड़ों से मैच करते कलर के मैट चुन लिए और शुरू हुआ सूर्य नमस्‍कार का एक शानदार सत्र. मैं काफी दिनों बाद योगा कर रहा था सो भूली हुई चीजों को पकड़ने में थोड़ी देर लगी. हर आसन के साथ एक बात समझ आ रही थी कि योगा एक दिन और काम हो गया वाली चीज नहीं है. इसका असल लाभ तभी मिलता है जब इसे जीवन में नियमित रूप से किया जाए. आज तो बस सीखना था...यहां से लौट कर कितना दोहरा पाऊंगा ये तो समय ही बताएगा. आधा घंटे के बाद शरीर का पुर्जा-पुर्जा खुल गया और फेंफड़ों में खूब ताजा हवा पहुंची तो इस योग का जादू समझ आया. विदेशी लोग हमारे योग के दीवाने होते जा रहे हैं और देसी लोग घर की मुर्गी दाल बराबर समझ कर योग को भूल ही चुके हैं. अच्‍छी बात है कि देश में अब धीरे-धीरे योग के प्रति जागरूकता बढ़ रही है. 
   
तस्‍वीर: दो घुमक्‍कड़
जाने से पहले रिसॉर्ट के मालिक दिलशेर से पूछ बैठा कि दुनिया के इस कौने में इतनी शानदार मेहमान-नवाजी में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है
? तो दिलशेर ने बताया कि कुछ दिक्‍क्‍तें तो आती हैं, मसलन हर चीज के लिए बंजार या गुशैणी के बाजारों पर निर्भर रहना पड़ता है. कभी-कभी रास्‍ता खराब होने की वजह से किसी चीज की सप्‍लाई नहीं हो पाती तो दिक्‍कत आती है. कभी-कभी गेस्‍ट किसी खास चीज की फरमाइश कर बैठते हैं जिसे पूरा करना संभव नहीं होता है. दिलशेर मुस्‍कुराते हुए कहते हैं कि वे अपनी तरफ़ से गेस्‍ट को सरप्राइज़ करने की पूरी कोशिश करते हैं, हां, किसी चीज का वायदा नहीं कर सकते. उनकी इस बात की गवाही पिछले दो दिनों का मेन्‍यू दे रहा था जिसमें बेहद स्‍वादिष्‍ट मगर घर जैसा खाना तमाम विविधताओं के साथ परोसा गया था. कुछ और समस्‍याएं दिलशेर के सामने आती हैं मगर उन्‍होंने उनका हल ढूंढ़ रखा है सिवाय मौसम की अड़चनों के. दिलशेर का मेहमान बनना भी अपने आप में काफी-कुछ सीखने और समझने का अवसर था. इंसान अगर जिंदादिल हो तो जंगल में भी मंगल कर सकता है. दिलशेर तीर्थन में वही कर रहे हैं.

अब योग भी हो चुका था और तकरीबन 11.30 बजे तक वापसी के लिए प्रस्‍थान भी. अब लगा कि यात्रा का किस्‍सा पूरा हो चुका है. अब सिर्फ वापसी ही होगी. मगर ये यात्रा हर कदम पर चौंका रही थी. अभी हमें नागिनी गांव में हिमाचल का प्रसिद्ध व्‍यंजन सिड्डू का भी जायका लेना था. हमारे ग्रुप में साथ चल रही मेधावी यहीं एक होमस्‍टे में रहती हैं. दुनिया घूमने और एक शांत जिंदगी की खोज में वे अपनी नौकरी और दीन-दुनिया को छोड़कर पिछले कई महीनों से यहीं आ बसी हैं. मेधावी ने हिमालय में तमाम शानदार ट्रैक किए हैं और अब तक उनकी एमएच12 नंबर की कार इस इलाके में उनकी पहचान बन चुकी है. सो होमस्‍टे की मालिक कविता जी ने हम सबके लिए सिड्डू तैयार किए हुए थे. सिड्डू दरअसल मैदा से बनने वाली डिश है जिसमें पिसे हुए ड्राई-फ्रूट और प्‍याज वगैरह से स्‍टफिंग की जाती है और इसे देसी घी और हरी चटनी के साथ खाया जाता है. साथ में गर्म चाय के कप ने इसके स्‍वाद को और बढ़ा दिया था. यहीं मुझे हाथ से बुने हुए खूबसूरत मोजे भी मिल गए. कुछ देर बिष्‍ट निवास से पास में बहती तीर्थन के निहारने के बाद मेधावी को अलविदा कहकर हम अपनी मंजिल दिल्‍ली की ओर लौट पड़े. किसी भी सफ़र से लौटते वक्‍़त हम असल में लौट ही कहां पाते हैं, हमारा मन जो पीछे रह जाता है. बस साथ चली आती हैं तो स्‍मृतियां...जो बार-बार उस दुनिया की ओर फिर से उड़ चलने का न्‍यौता देती रहती हैं. 


तस्‍वीर: दो घुमक्‍कड़



अलविदा....फिर मिलेंगे किसी और सफ़र पर. यायावरी पढ़ने के लिए अपना वक्‍़त देने का बहुत शुक्रिया. एक बार फिर  शुक्रिया TCBG का इस ख़ूबसूरत सफ़र के लिए.

#tcbg_trips #travelmedia #tirthananglersretreat 

Thursday, 25 May 2017

Tirthan Valley: A HIdden Paradise in Himachal

सफ़र एक सपनों की दुनिया का
तीर्थन वैली
उतरते अप्रैल के साथ जैसे ही दिल्‍ली का मौसम बदमिज़ाज होना शुरू होता है, मन सुकून की तलाश मे पहाड़ों की ओर देखने लगता है. अब तो आलम ये है कि जिस साल गर्मियों में पहाड़ों से मुलाक़ात न हो, समझो वो पूरा बरस ही बेचैनियों में गुज़रेगा. इस बार भी हाल कुछ ऐसा ही था. दिल्‍ली का पारा 40 पार पहुंच चुका था तभी अचानक एक यात्रा के बहाने पहाड़ों ने अपने पास बुला लिया. ये बुलावा तीर्थन वैली, हिमाचल से आया था. आपमें से कुछ दोस्‍तों ने यात्रा के दौरान पोस्‍ट किए गए कुछ फेसबुक पोस्‍ट पढ़ कर इस यात्रा के बारे में विस्‍तार से जानना चाहा था. सो आप सबके लिए पूरा किस्‍सा तफ़्सील के साथ पेश है.ैली कों

इंटरनेट की इसी मायावी दुनिया में एक छोटा सा कौना है यात्रा लेखकों और ब्‍लॉग लिखने वालों का. लोग खूब दुनिया घूमते हैं और अपने किस्‍से साझा करते हैं. देश के एक से एक घुमक्‍कड़ यहां मौजूद हैं. है न खूबसूरत बात? ये सिलसिला कोई दो साल पहले शुरू हुआ जब दो आला दर्जे की घुमक्‍कड़ों Alka Kaushik और Puneetinder Kaur ने बाकी बिखरे पड़े घुमक्‍कड़ों को एक मंच पर लाने का फैसला किया और TravelCorrespondants and Bloggers Group की शुरुआत की. तब से लेकर आज तक घुमक्‍कड़ जुड़ते चले जा रहे हैं और ये परिवार फलता-फूलता जा रहा है. रचनात्‍मक ऊर्जा से भरे इतने लोगों का एक मंच पर निरंतर सक्रीय रहना दूसरी खूबसूरत बात है. बस इसी खूबसूरत बात को सेलिब्रेट करने का विचार कुछ लोगों के मन में आया और तय हुआ कि इस खुशी को इस मायावी दुनिया से बाहर निकल कर असल दुनिया में साझा किया जाए.


दिल्‍ली से शुरू हुई इस यात्रा का पहला पड़ाव मुरथल था. वही मुरथल जिसके पराठों के मुरीद पूरे देश में हैं और अब आलम ये है कि मुरथल के नाम पर यहां से आगरा हाइवे पर उत्‍तर प्रदेश की सीमा तक तकरीबन दर्जन भर मुरथल ढ़ाबे खुल चुके हैं....हमारे देश में एक चीज पॉपुलर हो जाए तो लोग उसकी ऐसी-तैसी करने में देर नहीं लगाते. खैर, मैं जब कुरूक्षेत्र यूनिवर्सिटी में था तभी ये बात पक्‍की हो चुकी थी कि पराठों के शौकीनों के लिए मुरथल ही मक्‍का और मदीना है. आप मुरथल से गुज़रें और मुरथल के पराठें न खाएं तो यहां से गुज़र जाना गुनाह है. तो हम ये गुनाह कैसे कर सकते थे. इसलिए इस सफ़र के शुरू होते ही यहां सिर झुकाते हुए जाना तय हो चुका था. एक वक्‍़त था मुरथल में गुलशन ढ़ाबा का जादू सिर चढ़ कर बोलता था. फिर बाद सालों में यहां अमरीक-सुखदेव ने ग्राहकों की नब्‍ज़ पकड़ी और खूब तरक्‍की की. अब हालत ये है कि अमरीक-सुखदेव के ठाठ-बाट तो पांच-सितारा को मात दे रहे हैं मगर लोग कहने लगे हैं कि अब स्‍वाद के मामले में वो बात नहीं रही. खैर, इस बार हमने पहलवान ढ़ाबे को ट्राई करना बेहतर समझा और पहलवान ने निराश नहीं किया. उन सफेद मक्‍खन तैरते परांठों का जायका लेने के बाद ये कारवां एक बार फिर मंजिल की जानिब चल पड़ा. हमारे ट्रैवलर के बगल से गुज़रती गाडियां इस बात का अहसास दिला रही थीं कि हमारी रफ़्तार बेाथी ल़न लोमीटर के inder Kaur हुत ज्‍यादा नहीं है. आगे सफ़र लंबा था मगर मुझे लगा कि पानीपत तक भीड़-भड़क्‍का कम होगा तो शायद हम फर्राटा भर सकेंगे. खैर, रात होने लगी, कुछ साथियों ने खुद को नींद के हवाले किया और बाकी देश-दुनिया के मुद्दों पर समुद्र-मंथन में व्‍यस्‍त हो गए. नए लोगों से मिलना और उन्‍हें उनके विचारों से समझना किसी भी यात्रा का सबसे खूबसूरत पक्ष है. कुछ खुद का नज़रिया तराश पाते हैं और कुछ दूसरों से साझा कर पाते हैं.

सफ़र जारी रहा मगर नींद आंखों से कोसों दूर थी. गाड़ी में अगली सीटों पर बैठने का एक ख़ामियाजा होता है...ड्राइवर आपकी आंखों से बातें करता है. अगर आपकी आंख लगी तो फिर ड्राइवर को कब झपकी लग जाए इसका भरोसा नहीं. बस इस अहसास ने जगाए रखा. जब सुबह 6 बजे के करीब हम स्‍वारघाट पहुंचे तो पता चला कि मंजिल अभी बहुत दूर है....अब तक साफ हो चुका था कि हमारी रफ़्तार काफी कम थी.

सफ़र में थकान हो रही थी मगर, अब हमें पहाड़ों का सहारा था. उन्‍हें निहारते हुए हम आगे बढ़ते रहे. घूमते-घुमाते ओट टनल (ओट टनल से ही कुल्‍लू और मनाली के लिए रास्‍ता जाता है) के बाहर से गुज़र कर बंजार-साईरोपा-नागिनी-गुशैणी होते हुए हम उस गुमनाम सी मंजिल की ओर बढ़ रहे थे जिसका अता-पता जीपीएस भी साफ़-साफ़ नहीं बता पा रहा था और इंटरनेट पर भी ज्‍यादा जानकारी नहीं थी. मेरे दाईं ओर तीर्थन बह रही थी...इसका मतलब था कि अब हम तीर्थन घाटी में थे. बताए गए पते के मुताबिक हमें तीर्थन नदी को दो बार पुलों से पार करना था. तीर्थन नदी ही इस घाटी की पहचान है....दो ओर ऊंची पहाडियों के बीच बसी ये घाटी आगे बढ़ते हुए पलांचन घाटी को रास्‍ता देती है. पलांचन घाटी भी अपना नाम पलांचन नदी से लेती है जो तीर्थन नदी की ही एक ट्रिब्‍यूटरी है और आगे चलकर तीर्थन ब्यास नदी से जा मिलती है. हम जितना आगे बढ़ रहे थे हवा उतनी ही हल्‍की और मीठी होने लगी और पहाड़ उतने ही गहरे हरे रंग में रंगे नज़र आने लगे. सड़क की ऊंचाई से ही पलांचन का शोर साफ़ सुनाई दे रहा था. चारों ओर कुदरत की बेशुमार दौलत बिखरी पड़ी थी. 12-13 घंटे के सफ़र ने 18 घंटे से अधिक का समय लिया. लेकिन उस खूबसूरत मंजिल पर पहुंच कर ये सब अब बेमानी हो चुका था. इंटरनेट और मोबाइल का सिग्‍नल यहां से तकरीबन आठ किलोमीटर पीछे छूट चुका था पर अब इसकी परवाह किसे थी?

The Tirthan Anglers' retreat
सड़क से तकरीबन 200 मीटर नीचे घाटी में पलांचन नदी के किनारे बने द तीर्थन एंगलर्स रिट्रीट को देखते ही सफ़र की थकान उड़नछू हो गई. रिसॉर्ट तक उतरने के लिए घुमावदार रास्‍तों से ट्रैक करते हुए उतरना पड़ता है. जो अपने आप में रोमांचक है बशर्ते साथ में कोई बुजुर्ग या छोटे बच्‍चे न हों. हां, सामान को नीचे पहुंचाने के लिए सड़क से रिसॉर्ट तक पुली की व्‍यवस्था है.
 
यहां हमारे पड़ाव के लिए तय वक्‍़त में से आधा दिन तो सफ़र में ही खप चुका था सो कहीं कुछ देखने जाने का प्रोग्राम पहले ही खटाई में पड़ चुका था. मगर रिसॉर्ट और इसके आस-पास का नज़ारा इस कदर दिलकश था कि कहीं न भी जाया जाए तो तीन-चार दिन इसी जगह पर रह कर कुदरत से दोस्‍ती की जा सकती है. अब तक बारिश की झड़ी लग चुकी थी. पलांचन का दिल भर आया था और जैसे कहीं जाने की जल्‍दी में पूरे वेग से बही जा रही थी. उधर बारिश का पानी जब हज़ारों पेड़ों से रिस कर जमीन पर गिरता है तो लगता है जैसे सारे पेड़ नदी के गीत में कोरस दे रहे हों. एक मन किया कि बस यहीं बैठ कर प्रकृति के इस संगीत को देर तक सुना जाए. 



मगर घुमक्‍कड़ों से एक जगह टिका कहां जाता है. पैरों में चक्‍कर

होता है शायद. सो शाम को जब बाकी साथी रिसॉर्ट में चाय की चुस्कियां के साथ गपशप में लगे थे तब हम तीन घुमक्‍क्‍ड - दो घुमक्‍क्‍ड़ और मैं, बारिश के बीच छतरियां लेकर नज़दीकी गांवों की सैर पर निकल पड़े. कहीं भी जाओ...जब तक पैदल उतर कर कदमों से जगह को न नापो तो समझो कहीं गए ही नहीं. सो इस रिमझिम के बीच आगे बढ़ते हुए प्रकृति के अद्भुत नज़ारे एक-एक कर सामने तस्‍वीरों की तरह खुलते चले गए. मेरे साथ दो घुमक्‍कड़-मनीष और गार्गी थे. मनीष एयर ट्रैफिक कंट्रोलर हैं तो उनकी जीवन संगिनी गार्गी इंजीनियरिंग की लेक्‍चरर. मनीष शानदार फोटोग्राफ़र हैं तो गार्गी ब्‍लॉग लिखती हैं. ये हम लोगों की पहली मुलाक़ात थी मगर थोड़ी ही देर में लगने लगा कि जैसे हम लोग बरसों से आपस में परिचित हैं. 



सड़क पर कुछ बच्‍चे क्रिकेट खेलते नज़र आए. गांव में बमुश्किल आठ-दस घर होंगे और इन घरों के बीच है एक छोटा सा पोस्‍ट ऑफिस. बंजार तहसील का ये ब्रांच पोस्‍ट ऑफिस दिन में सिर्फ 2 से 5 बजे तक...बस्‍स. लोगों ने बताया कि एक महिला कर्मचारी यहां आती हैं और सब ठीक-ठाक चल रहा है. ये पोस्‍ट ऑफिस आस-पास के कई छोटे-छोटे गांवों के लिए बाहरी दुनिया से संपर्क का अच्‍छा माध्‍यम बना हुआ है क्‍योंकि इंटरनेट की पहुंच यहां से लगभग 10 किलोमीटर पीछे छूट चुकी है. जब तब बीएसएनएल का सिग्‍नल यहां चला आता है लेकिन हर वक्‍़त नहीं. और फिर पहाडों के सीधे-सादे लोगों को फेसबुक और वाट्सएप्‍प का मोह और जरूरत भी कहां है. लोग चिट्ठियां लिखते हैं और चिट्ठियों के जवाब का इंतज़ार करते हैं. यहां जि़दंगी की ज़रूरतें ही न के बराबर हैं. इस गांव तक आते-आते मुझे अपने डाक विभाग पर फ़ख्र महसूस होने लगा जो आम आदमी की जि़ंदगी में छोटी-छोटी खुशियां भर रहा है. यहां से कुछ दूर और आगे बढ़े तो एक माइलस्‍टोन बठाहड गांव 2 किलोमीटर दूर बता रहा था. मन तो था कि बठाहड तक भी हो आएं लेकिन अब दिन ढ़लने लगा था और रौशनी कम होने लगी. बारिश ने एक बार फिर अपना राग छेड़ दिया था. अब हम आस-पास की तस्‍वीरें लेते हुए अपने ठिकाने की ओर लौट लिए.



रिसॉर्ट में रात के खाने की तैयारी हो रही थी और उधर अगले दिन के मिशन की योजना भी तैयार हो रही थी. अब तक हमारी मंडली में दो और घुमक्‍कड़ शुभम मानसिंगका और जितादित्‍य भी शामिल हो चुके थे. ये दोनों अव्‍वल दर्जे के घूमंतू हैं. ये ज्ञानी महानुभाव पहले ही इस इलाके को काफ़ी हद तक खंगाल चुके थे सो इनकी सलाह पर ही मैंने अगले दिन विलेज-वॉक और जालोरी पास के विकल्‍पों में से जालोरी को चुना. मन तो विलेज-वॉक के लिए भी लालची हो रहा था मगर उस एक दिन में एक ही काम किया जा सकता था. सो तय हुआ कि जालोरी होकर आया जाए. यूं भी इस यात्रा पर आने से बहुत पहले अल्‍का जालोरी का जि़क्र कर चुकी थीं...सो ये तभी से मन में था.

अगले दिन सुबह नींद खुली तो कमरे की खिड़की से सामने जो देखा उस पर विश्‍वास ही नहीं हुआ. सामने की बादल उड़ते साफ़ नज़र आ रहे थे...वक्‍़त यही कोई 6.30 के आस-पास रहा होगा. मैं कैमरा उठा कर फटाक से बाहर निकला. बाहर का नज़ारा अद्भुत था. वाकई ग़ज़ब जगह थी ये जहां हर दो-चार घण्‍टे में मौसम अपने रंग बदल रहा था. अभी सभी सोए हुए थे तो चारों तरफ़ अजीब सी सुकून भरी खामोशी. हां, इस वक्‍़त साथ देने के लिए कोई वहां था तो छोटे-छोटे पक्षी जो सुबह होते ही दाना-पानी की तलाश में निकले थे और इस एकांत को भंग करती पलाचन. कुछ ही मिनटों में मुझे अहसास होने लगा कि हमारी शहरों की जिंदगी में जितनी भी भाग-दौड़ और आपा-धापी है वो काफी हद तक ग़ैर-ज़रूरी है. एक सुकून भरी जिंदगी के मोहताज हो चुके हैं हम लोग. जिंदगी को बेहद पेचीदा बना चुके हैं हम. प्रकृति के आगोश में आकर हम खुद को अपने और नज़दीक पाते हैं. शायद इसीलिए ये पहाड़ और वादियां हमें इतनी प्रिय हैं क्‍योंकि ये हमें हमारे वजूद के खोए हुए हिस्‍से का पता देते हैं.

जो लोग सिर्फ शिमला और मनाली काे ही हिमाचल समझते हैं उन्‍हें एक बार यहां जरूर आना चाहिए. असली हिमाचल यहां है.

इस जादू भरी दुनिया के पन्‍ने तो अभी बस खुलने ही शुरू हुए थे और यहां कुछ और करिश्‍मे अभी देखने बाकी थे. बारिश रुक नहीं रही थी मगर जालौरी पास के लिए निकलने से हमें नहीं रोक पाई. एक बार फिर हमने छतरियां संभालीं और गाडियों पर सवार होकर जालोरी पास की ओर निकल पड़े. तीर्थन एंगलर्स रिट्रीट से जालोरी का सफ़र तकरीबन 45 मिनट का है. इस रास्‍ते पर कुदरत के हसीन नज़ारों को ज़ेहन और कैमरों में जज़्ब करते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ ही रहे थे कि अचानक ड्राइवर ने हमारा ध्‍यान दूर ऊपर पहाडियों की ओर खींचा. जो देखा उस पर यकीन नहीं हो रहा था. ये अप्रैल की आखिरी तारीख थी और हमारी आंखों के सामने पहाडि़यों पर बर्फ़ गिर रही थी. ड्राइवर के मुताबिक हम लोग बहुत भाग्‍यशाली थे जो साल के इन दिनों में वहां स्‍नो-फॉल देख रहे थे. हमारे देखते-देखते हमारे आस-पास की दुनिया रंग बदलने लगी. हर चीज जैसे एक सफेद चादर ओढ़ने लगी हो. ऊपर पहाडियों ने तो पहले ही खुद को नर्म सफ़ेद शॉल में लपेट लिया था. बस अब मंजिल तक पहुंचने की बेकरारी और बढ़ गई. जल्‍दी–जल्‍दी बाकी रास्‍ता तय कर हम जालोरी-पास पर पहुंचे. अब तक तो पूरा लैंडस्‍केप ही बदल चुका था. ऐसा लग रहा था जैसे सृष्टि का रचयिता स्‍वयं आज हम सब पर मेहरबान था और पूरे स्‍नेह से अपने घर में हमारा स्‍वागत कर रहा था. इस मौसम में चारों तरफ़ बर्फ में ढ़की कायनात की हम कल्‍पना भी नहीं कर सकते थे और अब ये हक़ीकत बन कर हमारे सामने थे. हम लगभग 10,800 फीट की ऊंचाई पर थे और जोत पर बने तीन-चार ढ़ाबों और माता के मंदिर की छतें बर्फ़ से ढ़क चुकी थीं. जालोरी पास को स्‍थानीय लोग जलोड़ी जोत कहते हैं. ये पास शिमला जिले (रामनगर की ओर) को कुल्‍लू घाटी से जोड़ता है.





अब तक थोड़ी भूख भी लग चुकी थी सो जोत पर बने ढ़ाबों की कतार में से दूसरे ढ़ाबे में मैगी और चाय का आदेश देकर हम वहीं तफ़री करने लगे. ये ढ़ाबे हमारे हाइवे के आस-पास बने ढ़ाबों जैसे नहीं हैं. यूं समझिए कि सभ्‍यता से दूर किसी ने जैसे-तैसे भूखे मुसाफि़रों का पेट भरने के लिए जतन किया हुआ है. सब कुछ बहुत पुराना. बिजली यहां तक नहीं पहुंची है और साल में सिर्फ दो-तीन महीने ही खुलते हैं ये ढ़ाबे. अभी मैगी और चाय तैयार हो ही रही थी कि अचानक ढ़ाबे में पीछे पहाडि़यों की ओर एक दरवाजा खुला. सामने का दृश्‍य देख कर आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था. ये एक सपनों सी सुंदर दुनिया थी. दूर तलक सफ़ेद बर्फ़ की चादर, कहीं दूर शायद अभी भी बर्फ़ गिर रही थी, पेड़ों की शाखों और पत्तियों पर बर्फ़ रुई जैसे टुकड़े अटके हुए थे. ये बिल्‍कुल ऐसा था जैसे लूसी पेवेन्‍सी ने वार्डरोब का दरवाजा खोल दिया हो और नार्निया की एक जादुई दुनिया में प्रवेश कर गई हो. मेरी आंखों के सामने जो था वो एक तरह का नार्निया ही था. अब तक मैगी हाथों में आ चुकी थी. ये मैगी भी बड़े कमाल की चीज है....पहाड़ों पर इसका स्‍वाद अलग ही लगता है, जैसे इसमें खुद कोई जादुई ताकत हो. हम लोग काफ़ी देर वहां रुके. मन तो जैसे इंद्रजाल में कैद हो चुका था. धूप के चमकने के साथ जैसे-जैसे बर्फ़ ने पिघलना शुरू किया हमारा सम्‍मोहन कम हुआ.


इसके बाद तकरीबन पांच किलोमीटर का सफ़र तय कर हम जा पहुंचे खनाग रेस्‍ट हाउस. इस जगह की अपनी दिलचस्‍प दास्‍तां है. खनाग के इस रेस्‍ट हाउस में सामने लगा पत्‍थर लेडी पेनेलपी की याद दिलाता है. लेडी पेनेलपी भारत में ब्रिटिश सेना के पहले फील्‍ड मार्शल फिलिप की पुत्री थीं. पेनेलपी चेटवुड को हिमाचल के इस हिस्‍से से धीरे-धीरे मुहब्‍बत हो गई और उन्‍होंने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्‍सा इस इलाके में गुजारा. उन्‍हें यात्राओं पर लिखने का शौक था और अपनी यात्राओं के किस्‍सों को Kullu: The end of Habitable World नाम से एक किताब में दर्ज किया. और एक दिन लेडी पेनेलपी ने यही खनाग में ही अपनी ज़िंदगी की आख़िरी सांस ली. मैं किसी ट्रैवलर की याद में बना शायद पहला स्मारक देख रहा था. 

खनाग से वापिस तीर्थन के सफ़र लौट पड़े तो एक बार फिर जालोड़ी जोत होकर गुज़रे. मगर अब तक यहां का नज़ारा पूरी तरह बदल चुका था. बर्फ़ का नामोनिशान नहीं था. मानो किसी ने पूरी बर्फ़ जान-बूझकर साफ़ कर दी हो या फिर जैसे यहां कुछ हुआ ही न हो. ये भी कुदरत का एक रंग था. वापसी में रास्‍ते में एक गांव से गुज़रते हुए देवता की सवारी नज़र पड़ी. बंजार का मेला नज़दीक ही था. यहां एक परंपरा है कि ऐसे मेलों में आस-पास के गांवों के देवता इकट्ठे होते हैं. पहाड़ी लोक जीवन में ऐसी परंपराओं का बड़ा गहरा स्‍थान है. लोगों की इनमें और इनसे जुड़ी तमाम अन्‍य रस्‍मों और रिवाजों में पूरी आस्‍था है. शायद ऐसी परंपराएं ही समय के तेजी से बदलने के बावजूद आज भी यहां के जनजीवन को एक ताने-बाने में संजोए हुए हैं. पहाड़ के लोग आज भी स्‍वभाव में सरल हैं. भाग्‍यशाली हैं जो वे प्रकृ‍ति की गोद में बसे हैं. उनके जीवन में कठिनाइयां तो हैं मगर छल-कपट और गला-काट प्रतिस्‍पर्धा से उनकी जिंदगी कोसों दूर है.

मैं तीर्थन से लौट तो आया हूं मगर तीर्थन मेरे भीतर से अभी तक नहीं लौटा है. और शायद कभी लौट भी न पाए. वो जादुई दुनिया मुझे हमेशा अपनी ओर आकर्षित करती रहेगी. इस यात्रा के दौरान जो कई नए दोस्‍त भी बने...उम्‍मीद है उनसे मुलाक़ातों का सिलसिला आगे भी रहेगा. इस यात्रा के लिए सदैव TCBG का आभारी रहूंगा. साथ ही शुक्रिया रिसॉर्ट के मालिक दिलशेर मान का उनकी बेहतरीन मेहमाननवाज़ी का...दिलशेर दिल के भी शेर हैं :) 
यदि आप भी कुछ वक्‍़त के लिए सब-कुछ भूल कर खुद को ढूंढ़ना चाहते हैं तो तीर्थन वैली आपका इंतज़ार कर रही है. यदि आप तीर्थन एंगलर्स रिट्रीट का आनंद लेना चाहें तो टैरिफ़ या उपलब्‍धता के लिए सीधे दिलशेर मान से 08988496590 पर संपर्क कर सकते हैं. 
नेाट- जिन तस्‍वीरों पर दो घुमक्‍कड़ का वाटरमार्क दिख रहा है वे फ़ोटोग्राफ़र मित्र मनीष ने उतारी हैं...उनका बहुत शुक्रिया. शेष्‍ा तस्वीरेें यायावरी की अपनी हैं. 
कुछ किस्‍से अभी और भी हैं...पर फिलहाल कुछ और तस्‍वीरों के जरिए आप घूम आइए तीर्थन वैली ! 

इस यात्रा का भाग दो: तीर्थन वैली: सफ़र एक सपनों की दुनिया का  
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Friday, 27 January 2017

गणतंत्र दिवस का अर्थ और 68वां गणतंत्र दिवस समारोह

दिन था 26 जनवरी, 1950, जगह थी गवर्नमेंट हाउस का दरबार हॉल और वक्‍़त था सुबह के 10 बजकर 18 मिनट. ठीक इसी क्षण भारत ने एक गणराज्‍य के रूप में जन्‍म लिया था और ये क्षण भारत के इतिहास का सबसे गौरवमयी क्षण था. संविधान सभा 26 जनवरी, 1949 को देश के लिए नए संविधान को स्‍वीकार कर चुकी थी और 26 जनवरी, 1950 को इस संविधान के लागू होते ही भारत के स्‍वतंत्र और संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्‍य में परिवर्तित होने की प्रकिया पूरी हो गई. तकरीबन 10.30 बजे 31 बंदूकों की सलामी से भारत के पहले राष्‍ट्रपति की घोषणा भी हो गई. दरबार हॉल में एक सादगी भरे समारोह में श्री राजेन्‍द्र प्रसाद ने राष्‍ट्रपति पद की शपथ ली और इसके बाद पहले राष्‍ट्रपति श्री राजेन्‍द्र प्रसाद बग्घी में सवार होकर इरविन स्‍टेडियम के लिए निकले जिन्‍हें देखने के लिए पांच मील तक लोगों का हुजूम सड़कों पर जमा था. राष्‍ट्रपति महोदय ने इरविन स्‍टेडियम में झंडा फहरा कर सलामी ली. आज 68 वर्षों बाद भी गणतंत्र के उत्‍सव का ये सिलसिला पूरी गरिमा और भव्‍यता के साथ बदस्‍तूर जारी है. आज भी देश की जनता उसी उत्‍साह और भावनाओं के ज्‍वार के साथ दुनिया की इस सबसे भव्‍य गणतंत्र दिवस परेड़ को देखने आती है। ऐसे अनूठे आयोजन की पूरी दुनिया में कहीं कोई मिसाल नहीं.

मैं पिछले कई वर्षों से गणतंत्र दिवस परेड़ का साक्षी बनता रहा हूं. बचपन से ये परेड़ टीवी पर देखता आया हूं मगर राजपथ पर बैठकर अपनी आंखों से इसे देखना एक अद्भुत अनुभव है. इस अनुभव को सिर्फ वहीं बैठकर महसूस किया जा सकता है. मुझे लगता है कि देश के हर नागरिक को अपने जीवन में कम से कम एक बार तो इस परेड़ को राजपथ पर देखना चाहिए. हमें अपने बच्‍चों को भी ये परेड़ दिखानी चाहिए. केवल दिखानी ही नहीं उन्‍हें देश की स्‍वतंत्रता के इतिहास और देश पर अपनी जान न्‍यौछावर कर देने वाले वीर जवानों के बारे में भी बताना चाहिए. कम से कम एक माता-पिता के रूप में हम अपने बच्‍चों को स्‍वतंत्र देश के नागरिक होने का महत्‍व तो समझा पाएं. स्‍वतंत्रता अमूल्‍य अहसास है. हमारे देश ने बरसों तक गुलामी को भोगा है...हमसे बेहतर स्‍वतंत्रता का मूल्‍य और कौन समझ सकता है. 

ये सच है कि हमारा गणतंत्र अभी उतना परिपक्‍व नहीं हुआ है जितना इसे होना चाहिए. आज भी तंत्र के बीच गण कहीं अपनी जगह तलाशता नज़र आता है. मगर इतना अवश्‍य है कि हम निरंतर प्रगति के पथ पर आगे बढ़ रहे हैं. हमारे विकास के साथ-साथ हमारे विचार भी प्रगति कर रहे हैं और एक प्रगतिशील राष्‍ट्र के लिए भौतिक विकास से कहीं ज्‍यादा जरूरी वैचारिक प्रगति है. आज कितनी भी चरमपंथी और मजहबी ताकतें देश को बांटने का प्रयास कर रही हों, देश में आज भी इससे प्रेम करने वाले लोग पूरी निष्‍ठा के साथ इसके ताने-बाने को बनाए रखने के लिए प्रयासरत हैं और देश की सीमाओ के प्रहरी अपने प्राणों की आहुति देकर भी इसकी सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं।


इस सब के बीच एक बात मुझे अक्‍सर हैरत में डालती रही है. हर वर्ष इतनेे जोर-शोर से मनाए जाने के बावजूद देश की आम जनता में गणतंत्र दिवस और स्‍वतंत्रता दिवस को लेकर बहुत से भ्रम हैं. बहुत से लोग ये ही नहीं जानते कि हम 26 जनवरी क्‍यों मनाते हैं. इनमें अच्‍छे भले और पढ़े-लिखे लोगों की संख्‍या भी कम नहीं है. दोष हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था को दें या घर परिवार में माता-पिता से मिलने वाली शिक्षा को या फिर देश के सामाजिक माहौल को जिसमें अक्‍सर लोग स्‍वतंत्रता की कीमत भूलते नज़र आते हैं. कम लोग ही जानते हैं कि गणतंत्र दिवस 26 जनवरी को मनाने की एक खास वजह ये भी थी कि 1930 में इसी दिन भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस द्वारा ब्रिटिश सरकार के डोमिनियन स्‍टेटस के प्रस्‍ताव के विरोध में पूर्ण स्‍वाधीनता के प्रस्‍ताव को पारित किया था। गणतंत्र दिवस को लेकर लोगों में होने वाली गलतफ़हमियों में और भी कई चीजें शामिल हैं. मसलन बहुत से लोगों को लगता है कि 26 जनवरी को प्रधानमंत्री भाषण देते हैं. कुछ लोगों को लगता है कि राजपथ पर परेड़ 26 जनवरी के बजाए 15 अगस्‍त को निकलती है. मगर एक बात है. बेशक लोगों को इन दोनों राष्‍ट्रीय पर्वों की पेचीदगियों की जानकारी न हो मगर इन उत्‍सवों पर वे एक स्‍वतंत्र राष्‍ट्र के नागरिक के नाते अपने वतन के प्रति अपने प्रेम और देशभक्ति का इज़हार करना चाहते हैं.

हर बार की तरह इस बार की परेड़ भी भव्‍य और देश की सांस्‍कृतिक विविधता से भरी हुई थी. इस बार मैं प्रेस एन्‍क्‍लोज़र की अग्रिम पंक्तियों से इस परेड़ को देख रहा था. मेरे साथ Travel Correspondents and Bloggers Group के साथी मौजदू थे. कुछ पहली बार ये परेड़ देख रहे थे तो कुछ पहले भी कई मर्तबा इस अनूठे आयोजन का अनुभव ले चुके थे. इस बार के मुख्‍य अतिथि आबू धाबी के युवराज शेख मौहम्‍मद बिल ज़ायेद अल नाहयान थे. सउदी अरब के साथ भारत के पुराने संबंध रहे हैं. यूं भी, आज के अंतर्राष्‍ट्रीय परिदृश्‍य में मिडिल ईस्‍ट में हमें पुराने मित्रों से दोस्‍ती को और गहरी करने और नए मित्र बनाने की जरूरत है. युवराज का ये दौरा निस्‍संदेह भारत और यूएई के संबंधों में नई ताज़गी लेकर आएगा. 
 
राजपथ पर हर शख्‍़स की निगाहें प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी को ढूंढ रही थीं. कुछ देर में हमारे ठीक सामने श्री मोदी अपनी कार से उतरे तो राजपथ पर बैठे जन-समूह में एक हिलोर से उठ गई. तमाम चाहने वालों के चेहरे चमक उठे. अपने ड्रेस सेंस के लिए विख्‍यात प्रधानमंत्री इस बार गुलाबी साफे और बूंदीदार नीले वेस्‍ट कोट और सफ़ेद कुर्ते में सबसे अलग नज़र आ रहे थे.


हर वर्ष की तरह इस बार भी परेड़ में सशस्‍त्र सेनाओं के बैंड, दस्‍ते, सेवानिवृत्‍त सैन्‍य अधिकारी, बहादुर बच्‍चे, विभिन्‍न राज्‍यों की सांस्‍कृतिक विविधता को दर्शाती मनमोहक झांकियां, मोटर साइकिलों पर करतब दिखाते जवान, आसमान का सीना चीर कर फ्लाई-पास्‍ट करते वायु सेना के हैलीकॉप्‍टर, मिग, जगुआर, सुखोई और तमाम अन्‍य विमान. हां इस बार, एनएसजी कमांडो का दस्‍ता और तेजस विमान सबसे आकर्षण का प्रमुख केन्‍द्र थे. ऐसा बहुत कुछ था जिसे शब्‍दों के बजाए तस्‍वीरों से समझा जा सकता है. पूरी कहानी अब तस्‍वीरों की जुबानी.


















          सभी तस्‍वीरें रक्षा मंत्रालय के पीआर डिवीजन द्वारा उपलब्‍ध कराई गई हैं...उनका बहुत आभार.
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