यायावरी yayavaree: हम घूमते क्‍यों हैं? Why we Travel ?

Tuesday, 27 September 2016

हम घूमते क्‍यों हैं? Why we Travel ?

Why we Travel ?
हम घूमते क्‍यों हैं? वो क्‍या चीज है जो हमें बार-बार घर के सुख-चैन से दूर यात्राओं की चुनौती भरी राहों की ओर खींचती है? आखिर हमें यात्राओं से क्‍या हासिल होता है? वो कौन सी शै है जो तमाम लोगों को अच्‍छी भली नौकरियों को छोड़कर दुनिया देखने निकल पड़ने के जुनून से भर देती है? पिछले कई वर्षों में देश के तमाम हिस्‍सों में अपनी यात्राओं के दौरान मैं तमाम देशी-विदेशी घुमक्‍कड़ों और यायावरों से मिला. उनसे बातचीत में ये जरूर जानना चाहा कि यात्राओं के जरिए वे क्‍या खोज रहे हैं? हर बार कुछ अलग किस्‍म के जवाब मिले. अनदेखी दुनिया को देखने का आकर्षण तो पहली बात थी ही मगर उससे भी बढ़कर जो उन सब में साझा था वो था आत्‍म से साक्षात्‍कार. खुद को खोजना. या कहिए कि अपनी फितरत और भीतरी बुनावट को समझना. कुछ ने इसे एक तरह का मेडिटेशन बताया तो कुछ ने जीवन की एकरसता में मधुर संगीत. कई बार ऐसा भी हुआ कि लोगों ने बहुत से कारण गिनाए मगर उन्‍हें खुद नहीं पता था कि वे दरअसल इन यात्राओं के जरिए क्‍या हासिल करने निकले हैं? वे तमाम वजहें गिनाते, कि ये विश लिस्‍ट में था, या ये लाइफ में एक बार करना ही था. शायद वे अपनी भावनाओं को शब्‍दों का जामा नहीं पहना पा रहे थे मगर एक बात तय थी कि एक न एक दिन वे जरूर उस कारण को जान जाएंगे कि यात्राएं क्‍यों उन्‍हें अपनी ओर खींचती हैं. तकनीकी तौर पर एक टूरिस्‍ट और ट्रैवलर में अवश्‍य ही अंतर होता है. यूं तो दोनों ही यात्राएं करते हैं मगर दोनों के मकसद अलग होते हैं और उनके अनुभवों की तासीर भी. मैं खुद कभी किसी ट्रैवलर से टूरिस्‍ट के तौर पर मिला तो कभी किसी टूरिस्‍ट से बतौर ट्रैवलर. यात्राओं के दौरान दूसरों के किस्‍सों को सुनने और उनके अनुभवों और नजरियों को समझने का अपना अलग आनंद है. शायद इसी तरह दुनिया के बारे में हमारी समझ और नजरिया खुलता है. सोच की तंग गलियों को दूसरे छोर पर रौशनियां मिलती हैं तो दिमाग में बुरी तरह जम चुके पूर्वाग्रहों की काई साफ होती है. यात्राएं दो मुल्‍कों/प्रांतों के लोगों को ही एक दूसरे के करीब नहीं लातीं बल्कि दो संस्‍कृतियों को भी एक दूसरे के करीब लाती हैं. आइए एक बानगी देखिए कैसी-कैसी दुनिया और अनुभव मिलते हैं यात्राओं में:

दो महीने पहले मैं कोलकाता से दिल्‍ली लौट रहा था. सियालदाह राजधानी से दिल्‍ली तक के इस सफ़र में मेरे एक सहकर्मी भी मेरे साथ थे. ट्रेन वक्‍़त पर थी और जैसा कि अक्‍सर होता है कि एन ट्रेन छूटने से पहले कोई दुनिया भर के सामान के साथ गिरता पड़ता ट्रेन में जरूर चढ़ता है सो यहां भी एक आंटी जी तकरीबन सात-आठ भारी भरकम सूटकेसों, बैगों और थैलों के सा‍थ ट्रेन में चढ़ीं. इतना सामान सिर्फ उन आंटी का था इस बात का इल्‍म हमें तब हुआ जब उन्‍हें ट्रेन में चढ़ाने आए लोग ट्रेन के चलते ही उतर गए. इस कहानी में उन लोगों का किरदार यहीं तक था. इधर आंटी जी ने बिना किसी संकोच के जितनी जगह नज़र आई...अपने बैगों से ठूंस कर भर दी. मगर अभी भी उनके दो बैग खुद के लिए जगह तलाश रहे थे और इधर हम दो जन और ट्रेन के इस हिस्‍से में हमारे सामने की सीटों के यात्री आगे की कठिन होने वाली यात्रा का अंदाजा लगाते हुए एक दूसरे को खामोशी से देख रहे थे. ये हम चार-पांच यात्रियों का प्रथम मौन परिचय था. मैं और मेरे साथी साइड लोअर और साइड अपर पर थे और नीचे की दोनों सीटों पर दो उम्र दराज लोग इस तमाशे को देख रहे थे. अब कहानी में ट्व्स्टि ये था कि आंटी जी को अपर बर्थ अलॉट हुई थी सो ये भी साफ़ था कि वे तो ऊपर चढ़ने से रहीं. सबने मन ही मन घटा लिया था कि किसी नीचे वाले को अपनी सीट का बलिदान करना है. लेकिन ट्रेन में उनकी एंट्री से लेकर अब तक के उनके एक्‍शन को देख कर ये तय था कि उन्‍हें बाकी यात्रियों की रत्‍ती भर फिक्र न थी. सामने की सीट पर बैठे सज्‍जन आखिर कह ही उठे आप अकेली इतना सामान लेकर चल रही हैं आपको बाकी लागों के बारे में भी सोचना चाहिए. अब आंटी जी का जवाब सुनने लायक था... भाईसाहब अपनी मां के यहां से लौट रही हूं...मेरी चार बेटियां हैं...अब सबके लिए सामान लेकर जाना पड़ता है न....एक के यहां लेकर जाऊं, दूसरी के यहां खाली हाथ जाऊं ये तो नहीं हो सकता न’. पांच यात्रियों में से चार यात्री एक बार फिर एक दूसरे का चेहरा देख कर मौन संवाद कर रहे थे और यकीनन चारों यही सोच रहे थे कि आंटी जी अपनी मां के यहां उनसे मिलने गई थीं या बेटियों के लिए सामान लाने. अब हमें उनकी मां पर भी तरस आ रहा था. खैर, आपने पूछा नहीं कि पांच में से चार ही लोग क्‍यों दुखी थे ?

दरअसल पांचवांं यात्री एक विदेशी नागरिक था जो एक सिर्फ एक बैकपैक, एक हैंडबैग और एक गोल सी टोपी (हमारे यहां अरुणाचल प्रदेश की तरफ लोग पहनते हैं या फिर कुछ पूर्वी एशियाई देशों में) के साथ सफ़र कर रहा था. नाम था फ्लोरेन और फ्रांस का रहने वाला. सो बेचारा फ्लोरेन सिर्फ तमाशे को देख सकता था नीचे के दृश्‍य के संवादों का वह यकीनन आनंद नहीं ले पा रहा था. फिर भी विदेशी भाषा की इस फिल्‍म को कुछ-कुछ समझ रहा था. तो कुछ देर में हुआ कुछ ऐसा कि मैंने अपनी नीचे की सीट पर आंटी जी को विराजमान किया और उनके दो निरीह बैगों को पड़ौसी यात्रियों से एडजस्‍ट करने का अनुरोध कर ऊपर की बर्थ का रुख कर लिया. अब मेरे सामने वाली बर्थ पर फ्लोरेन था. हम दोनों की खूब जमने वाली थी. दो घुमक्‍क्‍ड़ आखिर कितनी देर चुप रहते. चंद मिनटों में ही एक दूसरे का हाल-चाल ले लिया. मुझे जैसे ही पता चला कि फ्लोरेन फ्रांस से है तो एकदम से एक अजीब दर्द ने मुझे अंदर तक भर दिया. एक रात पहले ही फ्रांस में एक बेकाबू ट्रक ने सैकड़ों लोगों को कुचल कर मार दिया था. ये फ्रांस पर कुछ ही महीने के अंतराल में दूसरा आतंकी हमला था. बच्‍चे तक इस आतंकी हमले का शिकार हुए. कोलकाता में अपने होटल के कमरे में इस ख़बर और घटना के दृश्‍यों को टीवी पर देख-देख कर मन पहले से ही भारी था और फ्लोरेन से परिचय होते ही इस घटना पर दुख का झरना जैसे खुद ब खुद फूट पड़ा. फ्लोरेन को भी जैसे अचानक अपना मन हल्‍का करने की खिड़की मिल गई थी. उसका कहना था कि न जाने ये सब किस दिन बंद होगा....मासूम बच्‍चे किसी का क्‍या बिगाड़ते हैं ?’ हम दोनों कुछ मिनटों के लिए खामोश हो गए. इस वक्‍़त मैंने महसूस किया कि जैसे मैं फ्लोरेन को बरसों से जानता हूं. दरअसल मैं फ्लोरेन को नहीं बल्कि आतंक के शिकार किसी भी देश के एक साधारण नागरिक को जानता था. ये हम सबकी साझी समस्‍या जो बन चुका है. हम सब इसके शिकार हैं. हम सब एक ही नाव में बैठे हैं. मैं इस वक्‍़त फ्रांस में होता और दुर्भाग्‍य से ये घटना पीछे मेरे अपने वतन में हुई होती तो समझ सकता हूं उस वक्‍़त में वहां क्‍या महसूस करता! इस वक्‍़त फ्लोरेन के अकेलेपन को समझना मुश्किल नहीं था. मैं सिर्फ इतना ही कर सकता था कि यात्रा के अगले 10-12 घंटों में वह अकेला महसूस न करे और जब वापस अपने देश लौटे तो इस सफ़र की अच्‍छी यादें ही उसके साथ रहें.

फ्लोरेन से इधर उधर की बातें होती रहीं और पता चला कि वह फ्रांस में इंजीनियर था और दुनिया देखने के लिए अपनी नौकरी छोड़कर पिछले लगभग नौ महीने से एक देश से दूसरे देश में यात्राएं कर रहा है. फ्रांस से कुछ यूरोपीय देशों में होता हुआ, चीन, बैंकॉक, भूटान, नेपाल, लाओस, वियतनाम और म्‍यांमार तक पहुंच गया. इस वक्‍़त वो एक दिन पहले ही म्‍यांमार से कोलकाता लौटा था और अब यहां से ट्रेन से दिल्‍ली और दिल्‍ली में एक सप्‍ताह रुकने के बाद फ्रांस वापिस लौटेगा. वहां उसकी सबसे प्रिय दोस्‍त की शादी है और उसने उससे वायदा किया है कि वो शादी में जरूर शामिल होगा. मैं सोच रहा था अपने यहां कितने लड़के ऐसी दोस्‍ती निभाते होंगे ! ये फ्लोरेन की भारत की पहली यात्रा थी और उसने भारत की राजधानी ट्रेन के बारे में सुना हुआ था सो जानबूझ कर इसी ट्रेन से दिल्‍ली तक का सफर तय कर रहा था. मैंने जब सुना कि फ्लोरेन तमाम देशों में औसतन महीन-सवा महीने ठहर कर आया है और भारत के लिए केवल सात दिन रखे हैं तो फ्लोरेन की क्‍लास ले ली. साफ़-साफ़ कह दिया कि भाई ये हमारे साथ सरासर नाइंसाफ़ी है. अगले दस मिनट में उसे बताया कि भाई हिंदोस्‍तान इतना अजब ग़ज़ब देश है कि यहां 10 बरस भी घूमोगे तो पूरे हिंदोस्‍तान को नहीं समझ पाओगे. एक अकेला शहर ही कम से कम एक सप्‍ताह मांगता है. चप्‍पे-चप्‍पे पर इतिहास बिखरा पड़ा है...हर शहर के साथ उसके नायाब जायके, शिल्‍प, परिधान बस मन मोह लेते हैं. फ्लोरेन की आंखें बड़ी हो गई थीं. लेकिन अब क्‍या किया जा सकता था? उसे तो सात दिन बाद उड़ जाना था अपने देश. सो अब फ्लोरेन ने वायदा किया कि वो जल्‍दी ही भारत लौटेगा और अबकी बार कम से कम एक महीने के लिए.

नीचे की एक सीट पर किसी कॉरपोरेशन में वरिष्‍ठ अधिकारी थे तो दूसरी सीट पर अ‍मेरिका में बसे मैथ्‍स के प्रोफ़े़ेसर जो आईआईटी धनबाद में व्‍याख्‍यान देकर लौट रहे थे. सुबह हो चुकी थी तो सुबह की महफिल चाय के साथ नीचे की सीटों पर ही जमी. सबने अपने अपने किस्‍से सुनाए और खूब ठहाके लगाए. मैंने फ्लोरेन की हालिया यात्राओं पर उसे और कुरेदा. इस बीच आप उन आंटी जी को मत भूल जाइएगा. वो साइड़ लोअर बर्थ में आराम से पर्दा गिरा कर घर से लाए स्‍वादिष्‍ट खाने का आनंद ले रही थीं और हम सिर्फ घर के खाने की उस खुश्‍बू से ही काम चला रहे थे. 

अब हुआ कुछ यूं कि कानपुर से कुछ किलोमीटर चलते ही ट्रेन बीच जंगल में ट्रेन खड़ी हो गई. एक घंटे तक कोई बताने वाला नहीं था कि क्‍या हुआ. बाद में कोच स्‍टाफ से पता चला कि इस ट्रेन के आगे चल रही डिब्रूगढ़ राजधानी का इंजन फेल हो गया है....अब जब तक वो ट्रैक से नहीं हटेगी हमारी ट्रेन आगे नहीं बढ़ सकती. गई भैंस पानी में. नाश्‍ता खाए भी 4 घंटे हो चुके थे और दोपहर के 1 बज रहे थे ...सबको भूख लग चुकी थी और अभी दिल्‍ली बहुत दूर थी. आंटी के पास खूब खाने-पीने का सामान था मगर उन्‍होंने तो किसी को हवा भी नहीं लगने दी. उनका ये व्‍यहार देख कर हमें गुस्‍सा कम हैरानी अधिक हो रही थी. वह यकीनन अभी तक किसी यात्रा पर नहीं गई थींं. मैं सोच रहा था कि आंटी जी को एक बार अकेले किसी यात्रा पर जरूर जाना चाहिए. फिर सोचा कि आंटी जी ही क्‍यों .....जीवन में हर व्‍यक्ति को कभी न कभी अकेले यात्रा पर जाना ही चाहिए. नजरिया जरूर बदलेगा. हम पहले से बेहतर इंसान बन कर लौटेंगे.

मुझे याद आया कि कोलकाता से चलते वक्‍़त मित्रों ने कोई मिठाई बैग में रखी है. डिब्‍बा खोला और सबके साथ साझा कर ली. ये कोलकाता की मशहूर मिठाई संदेश थी. फ्लोरेन को बड़ी स्‍वाद लगी...तो लो भाई एक और पीस. हमारा डिब्‍बा खुला तो प्रोफ़ेसर साहब ने भी भुने हुए चने निकाल लिए. फिर क्‍या था....थोड़ी बहुत नमकीन भी मिल गई वो कॉरपोरेशन वाले शख्‍़स के बैग से. इसके बाद हमारे पास खाने के लिए कुछ न था. पानी भी खत्‍म. ट्रेन की पैंट्री में भी कुछ न होने की ख़बर मिली. आंटी हम सबका तमाशा तो देख रही थीं मगर तिनका तक ऑफर नहीं किया. खैर, हम लोग अब अगले एक-दो घंटे भूख के जुल्‍म को टाल सकते थे. अभी हम लोग ऐसी स्थिति में रेलवे द्वारा आपातकालीन व्‍यवस्‍था रखने के विकल्‍पों पर विचार कर ही रहे थे कि ख़बर मिली कि जल्‍द ही सभी यात्रियों के खाने के लिए कुछ व्‍यवस्‍था की जा रही है. कोई घंटे भी बाद सभी को दाल और चावल परोसा गया. भूखे पेट यात्रियों को वो दाल और चावल बहुत स्‍वाद लगे. फ्लोरेन को भी. हम खुश थे कि फ्लोरेन की भारतीय रेल के बारे में धारणा गलत साबित नहीं हुई होगी. हमने न एक दूसरे का फोन नंबर लिया न कोई और संपर्क सूत्र. हम दोनों ही जानते थे कि ट्रेन के सफ़र की इस दोस्‍ती की उम्र इतनी ही है...और ये अपने आप में मुकम्‍मल जिंदगी थी इस छोटी सी दोस्‍ती की. रात को बात करते-करते फ्लोरेन की आंख लग गई तो चुपके से उसकी एक तस्‍वीर उतार ली. शायद ये तस्‍वीर हमेशा मुझे दुनिया देखने के उसके जुनून की याद दिलाती रहेगी. एक बैकपैक के साथ दुनिया देखने वाले हर यायावर में मुझे कुछ घंटों का ये दोस्‍त जरूर नज़र आएगा.

इस पूरे किस्‍से को इतने विस्‍तार से कहने का मेरा मक़सद सिर्फ उस अहसास को बयान करना है जो यात्राओं के दौरान हमारे खून में घुल कर हमें बिना बताए ही अंदर से तराशता है. हम कब एक नए परिवेश में घुल-मिल जाते हैं...हमें पता ही नहीं चलता. घर की चार दीवारों के बाहर गुज़ारा हुआ हर एक लम्‍हाa हम यात्रा में ही हैं और हर गुज़रते पल के साथ हमारे अनुभवों की पोटली और कीमती होती चलती है.

तो आज विश्‍व पर्यटन दिवस पर आप सभी को खूब शुभकामनाएं....खूब घूमिए .....दुनिया देखिए और पहले से और बेहतर इंसान बनिए.

2 comments:

  1. यह कहानी बहुत दिलचस्प है।मैने बहुत लोगो से घुमने फिरने के बारे मे पूछा तो सब लोग का इच्छा तो जताता है लेकिन अधिकांश लोग के अंदर जूनून कम पड़ जाता है ।कहता है बहुत काम है ये करना वो करना वगैरह ।जिन्दगी भर अपनी इच्छा को मार देता है ।कुछ साहसी लोग है जो अपनी जिन्दगी को अपनी तरह से जीता है। धन्यवाद !

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुक्रिया कपिल जी. याात्राओं के प्रति कुछ तो आकर्षण जीवन में होना ही चाहिए...हां कुछ लोगों की वाकई मजबूरियां हो सकती हैं और कुछ इसके आनंद से तब तक अनजान रहते हैं जब तक वे स्‍वयं किसी यात्रा पर न निकले हों. इसलिए सभी को जीवन में एक बार तो इसे ट्राई करना ही चाहिए.

      Delete