यायावरी yayavaree: 2016

Tuesday, 27 September 2016

हम घूमते क्‍यों हैं? Why we Travel ?

Why we Travel ?
हम घूमते क्‍यों हैं? वो क्‍या चीज है जो हमें बार-बार घर के सुख-चैन से दूर यात्राओं की चुनौती भरी राहों की ओर खींचती है? आखिर हमें यात्राओं से क्‍या हासिल होता है? वो कौन सी शै है जो तमाम लोगों को अच्‍छी भली नौकरियों को छोड़कर दुनिया देखने निकल पड़ने के जुनून से भर देती है? पिछले कई वर्षों में देश के तमाम हिस्‍सों में अपनी यात्राओं के दौरान मैं तमाम देशी-विदेशी घुमक्‍कड़ों और यायावरों से मिला. उनसे बातचीत में ये जरूर जानना चाहा कि यात्राओं के जरिए वे क्‍या खोज रहे हैं? हर बार कुछ अलग किस्‍म के जवाब मिले. अनदेखी दुनिया को देखने का आकर्षण तो पहली बात थी ही मगर उससे भी बढ़कर जो उन सब में साझा था वो था आत्‍म से साक्षात्‍कार. खुद को खोजना. या कहिए कि अपनी फितरत और भीतरी बुनावट को समझना. कुछ ने इसे एक तरह का मेडिटेशन बताया तो कुछ ने जीवन की एकरसता में मधुर संगीत. कई बार ऐसा भी हुआ कि लोगों ने बहुत से कारण गिनाए मगर उन्‍हें खुद नहीं पता था कि वे दरअसल इन यात्राओं के जरिए क्‍या हासिल करने निकले हैं? वे तमाम वजहें गिनाते, कि ये विश लिस्‍ट में था, या ये लाइफ में एक बार करना ही था. शायद वे अपनी भावनाओं को शब्‍दों का जामा नहीं पहना पा रहे थे मगर एक बात तय थी कि एक न एक दिन वे जरूर उस कारण को जान जाएंगे कि यात्राएं क्‍यों उन्‍हें अपनी ओर खींचती हैं. तकनीकी तौर पर एक टूरिस्‍ट और ट्रैवलर में अवश्‍य ही अंतर होता है. यूं तो दोनों ही यात्राएं करते हैं मगर दोनों के मकसद अलग होते हैं और उनके अनुभवों की तासीर भी. मैं खुद कभी किसी ट्रैवलर से टूरिस्‍ट के तौर पर मिला तो कभी किसी टूरिस्‍ट से बतौर ट्रैवलर. यात्राओं के दौरान दूसरों के किस्‍सों को सुनने और उनके अनुभवों और नजरियों को समझने का अपना अलग आनंद है. शायद इसी तरह दुनिया के बारे में हमारी समझ और नजरिया खुलता है. सोच की तंग गलियों को दूसरे छोर पर रौशनियां मिलती हैं तो दिमाग में बुरी तरह जम चुके पूर्वाग्रहों की काई साफ होती है. यात्राएं दो मुल्‍कों/प्रांतों के लोगों को ही एक दूसरे के करीब नहीं लातीं बल्कि दो संस्‍कृतियों को भी एक दूसरे के करीब लाती हैं. आइए एक बानगी देखिए कैसी-कैसी दुनिया और अनुभव मिलते हैं यात्राओं में:

दो महीने पहले मैं कोलकाता से दिल्‍ली लौट रहा था. सियालदाह राजधानी से दिल्‍ली तक के इस सफ़र में मेरे एक सहकर्मी भी मेरे साथ थे. ट्रेन वक्‍़त पर थी और जैसा कि अक्‍सर होता है कि एन ट्रेन छूटने से पहले कोई दुनिया भर के सामान के साथ गिरता पड़ता ट्रेन में जरूर चढ़ता है सो यहां भी एक आंटी जी तकरीबन सात-आठ भारी भरकम सूटकेसों, बैगों और थैलों के सा‍थ ट्रेन में चढ़ीं. इतना सामान सिर्फ उन आंटी का था इस बात का इल्‍म हमें तब हुआ जब उन्‍हें ट्रेन में चढ़ाने आए लोग ट्रेन के चलते ही उतर गए. इस कहानी में उन लोगों का किरदार यहीं तक था. इधर आंटी जी ने बिना किसी संकोच के जितनी जगह नज़र आई...अपने बैगों से ठूंस कर भर दी. मगर अभी भी उनके दो बैग खुद के लिए जगह तलाश रहे थे और इधर हम दो जन और ट्रेन के इस हिस्‍से में हमारे सामने की सीटों के यात्री आगे की कठिन होने वाली यात्रा का अंदाजा लगाते हुए एक दूसरे को खामोशी से देख रहे थे. ये हम चार-पांच यात्रियों का प्रथम मौन परिचय था. मैं और मेरे साथी साइड लोअर और साइड अपर पर थे और नीचे की दोनों सीटों पर दो उम्र दराज लोग इस तमाशे को देख रहे थे. अब कहानी में ट्व्स्टि ये था कि आंटी जी को अपर बर्थ अलॉट हुई थी सो ये भी साफ़ था कि वे तो ऊपर चढ़ने से रहीं. सबने मन ही मन घटा लिया था कि किसी नीचे वाले को अपनी सीट का बलिदान करना है. लेकिन ट्रेन में उनकी एंट्री से लेकर अब तक के उनके एक्‍शन को देख कर ये तय था कि उन्‍हें बाकी यात्रियों की रत्‍ती भर फिक्र न थी. सामने की सीट पर बैठे सज्‍जन आखिर कह ही उठे आप अकेली इतना सामान लेकर चल रही हैं आपको बाकी लागों के बारे में भी सोचना चाहिए. अब आंटी जी का जवाब सुनने लायक था... भाईसाहब अपनी मां के यहां से लौट रही हूं...मेरी चार बेटियां हैं...अब सबके लिए सामान लेकर जाना पड़ता है न....एक के यहां लेकर जाऊं, दूसरी के यहां खाली हाथ जाऊं ये तो नहीं हो सकता न’. पांच यात्रियों में से चार यात्री एक बार फिर एक दूसरे का चेहरा देख कर मौन संवाद कर रहे थे और यकीनन चारों यही सोच रहे थे कि आंटी जी अपनी मां के यहां उनसे मिलने गई थीं या बेटियों के लिए सामान लाने. अब हमें उनकी मां पर भी तरस आ रहा था. खैर, आपने पूछा नहीं कि पांच में से चार ही लोग क्‍यों दुखी थे ?

दरअसल पांचवांं यात्री एक विदेशी नागरिक था जो एक सिर्फ एक बैकपैक, एक हैंडबैग और एक गोल सी टोपी (हमारे यहां अरुणाचल प्रदेश की तरफ लोग पहनते हैं या फिर कुछ पूर्वी एशियाई देशों में) के साथ सफ़र कर रहा था. नाम था फ्लोरेन और फ्रांस का रहने वाला. सो बेचारा फ्लोरेन सिर्फ तमाशे को देख सकता था नीचे के दृश्‍य के संवादों का वह यकीनन आनंद नहीं ले पा रहा था. फिर भी विदेशी भाषा की इस फिल्‍म को कुछ-कुछ समझ रहा था. तो कुछ देर में हुआ कुछ ऐसा कि मैंने अपनी नीचे की सीट पर आंटी जी को विराजमान किया और उनके दो निरीह बैगों को पड़ौसी यात्रियों से एडजस्‍ट करने का अनुरोध कर ऊपर की बर्थ का रुख कर लिया. अब मेरे सामने वाली बर्थ पर फ्लोरेन था. हम दोनों की खूब जमने वाली थी. दो घुमक्‍क्‍ड़ आखिर कितनी देर चुप रहते. चंद मिनटों में ही एक दूसरे का हाल-चाल ले लिया. मुझे जैसे ही पता चला कि फ्लोरेन फ्रांस से है तो एकदम से एक अजीब दर्द ने मुझे अंदर तक भर दिया. एक रात पहले ही फ्रांस में एक बेकाबू ट्रक ने सैकड़ों लोगों को कुचल कर मार दिया था. ये फ्रांस पर कुछ ही महीने के अंतराल में दूसरा आतंकी हमला था. बच्‍चे तक इस आतंकी हमले का शिकार हुए. कोलकाता में अपने होटल के कमरे में इस ख़बर और घटना के दृश्‍यों को टीवी पर देख-देख कर मन पहले से ही भारी था और फ्लोरेन से परिचय होते ही इस घटना पर दुख का झरना जैसे खुद ब खुद फूट पड़ा. फ्लोरेन को भी जैसे अचानक अपना मन हल्‍का करने की खिड़की मिल गई थी. उसका कहना था कि न जाने ये सब किस दिन बंद होगा....मासूम बच्‍चे किसी का क्‍या बिगाड़ते हैं ?’ हम दोनों कुछ मिनटों के लिए खामोश हो गए. इस वक्‍़त मैंने महसूस किया कि जैसे मैं फ्लोरेन को बरसों से जानता हूं. दरअसल मैं फ्लोरेन को नहीं बल्कि आतंक के शिकार किसी भी देश के एक साधारण नागरिक को जानता था. ये हम सबकी साझी समस्‍या जो बन चुका है. हम सब इसके शिकार हैं. हम सब एक ही नाव में बैठे हैं. मैं इस वक्‍़त फ्रांस में होता और दुर्भाग्‍य से ये घटना पीछे मेरे अपने वतन में हुई होती तो समझ सकता हूं उस वक्‍़त में वहां क्‍या महसूस करता! इस वक्‍़त फ्लोरेन के अकेलेपन को समझना मुश्किल नहीं था. मैं सिर्फ इतना ही कर सकता था कि यात्रा के अगले 10-12 घंटों में वह अकेला महसूस न करे और जब वापस अपने देश लौटे तो इस सफ़र की अच्‍छी यादें ही उसके साथ रहें.

फ्लोरेन से इधर उधर की बातें होती रहीं और पता चला कि वह फ्रांस में इंजीनियर था और दुनिया देखने के लिए अपनी नौकरी छोड़कर पिछले लगभग नौ महीने से एक देश से दूसरे देश में यात्राएं कर रहा है. फ्रांस से कुछ यूरोपीय देशों में होता हुआ, चीन, बैंकॉक, भूटान, नेपाल, लाओस, वियतनाम और म्‍यांमार तक पहुंच गया. इस वक्‍़त वो एक दिन पहले ही म्‍यांमार से कोलकाता लौटा था और अब यहां से ट्रेन से दिल्‍ली और दिल्‍ली में एक सप्‍ताह रुकने के बाद फ्रांस वापिस लौटेगा. वहां उसकी सबसे प्रिय दोस्‍त की शादी है और उसने उससे वायदा किया है कि वो शादी में जरूर शामिल होगा. मैं सोच रहा था अपने यहां कितने लड़के ऐसी दोस्‍ती निभाते होंगे ! ये फ्लोरेन की भारत की पहली यात्रा थी और उसने भारत की राजधानी ट्रेन के बारे में सुना हुआ था सो जानबूझ कर इसी ट्रेन से दिल्‍ली तक का सफर तय कर रहा था. मैंने जब सुना कि फ्लोरेन तमाम देशों में औसतन महीन-सवा महीने ठहर कर आया है और भारत के लिए केवल सात दिन रखे हैं तो फ्लोरेन की क्‍लास ले ली. साफ़-साफ़ कह दिया कि भाई ये हमारे साथ सरासर नाइंसाफ़ी है. अगले दस मिनट में उसे बताया कि भाई हिंदोस्‍तान इतना अजब ग़ज़ब देश है कि यहां 10 बरस भी घूमोगे तो पूरे हिंदोस्‍तान को नहीं समझ पाओगे. एक अकेला शहर ही कम से कम एक सप्‍ताह मांगता है. चप्‍पे-चप्‍पे पर इतिहास बिखरा पड़ा है...हर शहर के साथ उसके नायाब जायके, शिल्‍प, परिधान बस मन मोह लेते हैं. फ्लोरेन की आंखें बड़ी हो गई थीं. लेकिन अब क्‍या किया जा सकता था? उसे तो सात दिन बाद उड़ जाना था अपने देश. सो अब फ्लोरेन ने वायदा किया कि वो जल्‍दी ही भारत लौटेगा और अबकी बार कम से कम एक महीने के लिए.

नीचे की एक सीट पर किसी कॉरपोरेशन में वरिष्‍ठ अधिकारी थे तो दूसरी सीट पर अ‍मेरिका में बसे मैथ्‍स के प्रोफ़े़ेसर जो आईआईटी धनबाद में व्‍याख्‍यान देकर लौट रहे थे. सुबह हो चुकी थी तो सुबह की महफिल चाय के साथ नीचे की सीटों पर ही जमी. सबने अपने अपने किस्‍से सुनाए और खूब ठहाके लगाए. मैंने फ्लोरेन की हालिया यात्राओं पर उसे और कुरेदा. इस बीच आप उन आंटी जी को मत भूल जाइएगा. वो साइड़ लोअर बर्थ में आराम से पर्दा गिरा कर घर से लाए स्‍वादिष्‍ट खाने का आनंद ले रही थीं और हम सिर्फ घर के खाने की उस खुश्‍बू से ही काम चला रहे थे. 

अब हुआ कुछ यूं कि कानपुर से कुछ किलोमीटर चलते ही ट्रेन बीच जंगल में ट्रेन खड़ी हो गई. एक घंटे तक कोई बताने वाला नहीं था कि क्‍या हुआ. बाद में कोच स्‍टाफ से पता चला कि इस ट्रेन के आगे चल रही डिब्रूगढ़ राजधानी का इंजन फेल हो गया है....अब जब तक वो ट्रैक से नहीं हटेगी हमारी ट्रेन आगे नहीं बढ़ सकती. गई भैंस पानी में. नाश्‍ता खाए भी 4 घंटे हो चुके थे और दोपहर के 1 बज रहे थे ...सबको भूख लग चुकी थी और अभी दिल्‍ली बहुत दूर थी. आंटी के पास खूब खाने-पीने का सामान था मगर उन्‍होंने तो किसी को हवा भी नहीं लगने दी. उनका ये व्‍यहार देख कर हमें गुस्‍सा कम हैरानी अधिक हो रही थी. वह यकीनन अभी तक किसी यात्रा पर नहीं गई थींं. मैं सोच रहा था कि आंटी जी को एक बार अकेले किसी यात्रा पर जरूर जाना चाहिए. फिर सोचा कि आंटी जी ही क्‍यों .....जीवन में हर व्‍यक्ति को कभी न कभी अकेले यात्रा पर जाना ही चाहिए. नजरिया जरूर बदलेगा. हम पहले से बेहतर इंसान बन कर लौटेंगे.

मुझे याद आया कि कोलकाता से चलते वक्‍़त मित्रों ने कोई मिठाई बैग में रखी है. डिब्‍बा खोला और सबके साथ साझा कर ली. ये कोलकाता की मशहूर मिठाई संदेश थी. फ्लोरेन को बड़ी स्‍वाद लगी...तो लो भाई एक और पीस. हमारा डिब्‍बा खुला तो प्रोफ़ेसर साहब ने भी भुने हुए चने निकाल लिए. फिर क्‍या था....थोड़ी बहुत नमकीन भी मिल गई वो कॉरपोरेशन वाले शख्‍़स के बैग से. इसके बाद हमारे पास खाने के लिए कुछ न था. पानी भी खत्‍म. ट्रेन की पैंट्री में भी कुछ न होने की ख़बर मिली. आंटी हम सबका तमाशा तो देख रही थीं मगर तिनका तक ऑफर नहीं किया. खैर, हम लोग अब अगले एक-दो घंटे भूख के जुल्‍म को टाल सकते थे. अभी हम लोग ऐसी स्थिति में रेलवे द्वारा आपातकालीन व्‍यवस्‍था रखने के विकल्‍पों पर विचार कर ही रहे थे कि ख़बर मिली कि जल्‍द ही सभी यात्रियों के खाने के लिए कुछ व्‍यवस्‍था की जा रही है. कोई घंटे भी बाद सभी को दाल और चावल परोसा गया. भूखे पेट यात्रियों को वो दाल और चावल बहुत स्‍वाद लगे. फ्लोरेन को भी. हम खुश थे कि फ्लोरेन की भारतीय रेल के बारे में धारणा गलत साबित नहीं हुई होगी. हमने न एक दूसरे का फोन नंबर लिया न कोई और संपर्क सूत्र. हम दोनों ही जानते थे कि ट्रेन के सफ़र की इस दोस्‍ती की उम्र इतनी ही है...और ये अपने आप में मुकम्‍मल जिंदगी थी इस छोटी सी दोस्‍ती की. रात को बात करते-करते फ्लोरेन की आंख लग गई तो चुपके से उसकी एक तस्‍वीर उतार ली. शायद ये तस्‍वीर हमेशा मुझे दुनिया देखने के उसके जुनून की याद दिलाती रहेगी. एक बैकपैक के साथ दुनिया देखने वाले हर यायावर में मुझे कुछ घंटों का ये दोस्‍त जरूर नज़र आएगा.

इस पूरे किस्‍से को इतने विस्‍तार से कहने का मेरा मक़सद सिर्फ उस अहसास को बयान करना है जो यात्राओं के दौरान हमारे खून में घुल कर हमें बिना बताए ही अंदर से तराशता है. हम कब एक नए परिवेश में घुल-मिल जाते हैं...हमें पता ही नहीं चलता. घर की चार दीवारों के बाहर गुज़ारा हुआ हर एक लम्‍हाa हम यात्रा में ही हैं और हर गुज़रते पल के साथ हमारे अनुभवों की पोटली और कीमती होती चलती है.

तो आज विश्‍व पर्यटन दिवस पर आप सभी को खूब शुभकामनाएं....खूब घूमिए .....दुनिया देखिए और पहले से और बेहतर इंसान बनिए.

Wednesday, 17 August 2016

आजादी की 70वीं सालगिरह का उत्‍सव : भारत पर्व

भारत पर्व @ राजपथ

देश आजादी की 70वीं सालगिरह मना रहा है. यूं तो अब तक देश में 50वीं, 75वीं या 100वीं वर्षगांठ मनाने का चलन रहा है मगर इस बार दिल्‍ली आजादी की 70वीं सालगिरह को पूरे जोशोखरोश के साथ मना रही है. हर चीज भव्‍य और बड़ी. हर ओर उत्‍सव. दिल्‍ली भारत पर्व मना रही है. इंडिया गेट के दोनों ओर के हरी घास के मैदानों में इन दिनों मानो पूरा हिंदोस्‍तान उतर आया है. हर रोज दोपहर 2 से रात 9 बजे तक कश्‍मीर से केरल और अरुणाचल प्रदेश से गुजरात तक की बहुरंगी दुनिया ढ़ोल नगाड़ों की धमक और लोक नृत्‍यों की थिरकन के साथ जीवंत हो उठती है. ये मेला राजपथ पर जनपथ क्रॉसिंग से लेकर बडौदा हाउस वाली क्रॉसिंग के बीच सजा है. यदि आप राजपथ पर केन्‍द्रीय सचिवालय की ओर से आकर मेले में प्रवेश करते हैं तो मुख्‍य द्वार के पास पर्यटन मंत्रालय की ओर से देश के पर्यटक स्‍थलों के मनमोहक नजारों के बड़े होर्डिंग आपका स्‍वागत करते हैं. बस उन्‍हें निहारते निहारते मेले में कब प्रवेश हो जाता है पता ही नहीं चलता. मेले में प्रवेश करते ही राजपथ पर सड़क के बीचों-बीच हिन्‍दी में सजे अतुल्‍य भारत के बड़े से मॉडल के पास लोग सेल्फ़ी लेते नज़र आ जाएंगे. बस इसी राजपथ के दांई ओर देश के हर राज्‍य के पैवेलियन सजे हैं जिनमें उन राज्‍यों के पर्यटक स्‍थलों की पूरी जानकारी उपलब्‍ध है. थोड़ा आगे चलकर हैंडीक्राफ्ट बाजार हमारा स्‍वागत करता है जिसमें तमाम राज्‍यों के खूबसूरत हस्‍तशिल्‍प खरीदे जा सकते हैं. खूब लंबे हरे घास के इन मैदानों में पैवेलियनों के बीच ही कई मंच सजे हैं जिन पर सांस्‍कृतिक कार्यक्रम दूर से ही दर्शकों को लुभा रहे हैं. आप कह सकते हैं कि ये मेला कुछ कुछ ट्रेड फेयर जैसा ही है. मगर असल बात यहां भारत को सेलिब्रेट करने की है जो इसे ट्रेड फेयर से कई मायनों में अलग करती है.

वहीं कहीं भारत सरकार को मेक इन इंडिया का लोगो वाले शेर की प्रतिकृति भी मौजूद है. घूमते-घुमाते हम इंडिया गेट तक पहुंच जाते हैं. इंडिया गेट के एकदम ऊपर रौशनी से बना तिरंगा बेहद खूबसूरत नज़र आता है. और राजपथ के दूसरी ओर प्रवेश करने से पहले अंग्रेजी में लिखा Incredible India एक बार फिर सेल्‍फी प्रेमियों को आकर्षित करता नज़र आता है. चटख रंगों वाले इस मॉडल के पास से गुज़रते हुए दूर राष्‍ट्रपति भवन पर जगमगा उठने वाली रौशनियां जैसे इस समूचे आयोजन की भव्‍यता में चार चांद लगा देती हैं. अब बारी है राजपथ की दूसरी ओर सजे राज्‍यों के फूड कोर्ट्स की. यहां अमूमन हर राज्‍य का अपना अलग फूड कोर्ट मौजूद है जिसमें वहां के लजीज व्‍यंजन खूब लुभा रहे हैं. मेरे पास वक्‍़त की कमी थी और दूसरे स्‍वाद के मामले में राजस्‍थान हमेशा मेरी पहली पसंद रहा है सो कदम सीधे राजस्‍थान के स्‍टॉल पर जाकर रुके. अपनी पसंदीदा जोधपुरी कचौड़ी ने पिछले तीन घंटों की पूरा थकान को पल भर में भुला दिया. यहां तमाम होटल मैनेजमेंट कॉलेजों के स्‍टूडेंट्स भी पाक कला में अपने जौहर दिखा रहे हैं. कुल मिलाकर एक मुकम्‍मल ठिकाना है जहां हर तरह के स्‍वाद के दीवाने मन भर कर खा सकते हैं।


आप अगर अभी तक नहीं गए हैं तो जरूर होकर आइए...इसे मिस मत कीजिएगा. ये खेल तमाशा कल 18 अगस्‍त रात 9 बजे तक मौजूद रहेगा. बाकी की कहानी इन तस्‍वीरों की जुबानी सुनिए.


























#bharatparv #incredibleindia #ministryoftourism #ministryofculture #indiagate 

Friday, 12 August 2016

इतिहास का झरोखा 'द बंगाल क्‍लब' ....Oldest surviving Club 'The Bengal Club'

'द बंगाल क्‍लब'
हर यात्रा अपने साथ जाने-अनजाने शहरों में अलग-अलग जगहों पर ठहरने का अनुभव लेकर आती है। पांच या सात सितारा होटलों की ऊब से दूर इस बार कोलकाता की यात्रा वहां ठहरने के मामले में एक यादगार अनुभव दे गई। इस बार मौका मिला 189 साल पुराने और दुनिया के सबसे पुराने क्‍लबों की फेहरिस्‍त में शुमार द बंगाल क्‍लब में ठहरने का।
इस बात में कोई शुबहा नहीं कि कोलकाता शहर ने बरसों पुराने इतिहास को बड़ी नज़ाकत और मुहब्‍बत के साथ आज भी संजो कर रखा हुआ है। इसके चप्‍प-चप्‍पे से इतिहास आज भी खुद हमारे सामने खड़ा होकर अपने किस्‍से बयां करता है। कुछ ऐसा ही किस्‍सा देश के सबसे पुराने क्‍लब द बंगाल क्‍लब का भी है। 1 फरवरी, 1827 को कलकत्‍ता में स्‍थापित किया गया द बंगाल क्‍लब देश ही नहीं बल्कि दुनिया के सबसे पुराने और आज भी जिंदा क्‍लबों में से एक है। इसके बाद द मद्रास क्‍लब (1831), द एथेनेअम (1824), द ऑक्‍सफोर्ड एंड कैम्ब्रिज (1830), द गैरिक (1831), द कार्लटन (1832), और द रिफॉर्म (1837) का ही नाम लिया जा सकता है। 1827 देश के इतिहास का वह दौर था जब ईस्‍ट इंडिया कंपनी धीरे-धीरे देश की हुकूमत की कमान अपने हाथों में ले रही थी और कलकत्‍ता इस पूरी कवायद का केन्‍द्र बना हुआ था। यही वो समय था जब साहिब लोग एक ऐसी सामाजिक व्‍यवस्‍था बना रहे थे जो 100 साल से ज्‍यादा चलने वाली थी।
यकीनन ही इस क्‍लब का इतिहास ब्रिटिश हुकूमत के सबसे बड़े नामों से ही रौशन रहा है और बरसों तक किसी भारतीय को इस क्‍लब में प्रवेश तक की भी इजाजत नहीं थी। मगर आज के दौर में इस जीती जागती विरासत को भारतीयों द्वारा अपना लिए जाने के बाद इसके इतिहास के पन्‍नों को पलटना लाजिमी हो जाता है।
क्‍लब के पहले अध्‍यक्ष और पहले संरक्षक ईस्‍ट इंडिया कंपनी की फौज के कमांडर इन चीफ ले. कर्नल जे फिंच थे जिनका 1829 का आदमकद पोट्रेट आज भी डाइनिंग हॉल में पूरी शान से सजा हुआ है। उस दौर में क्‍लब के सदस्‍यों में केवल फौजी अफसर, आला दर्जे के प्रशासनिक अधिकारी और कुछ मेडिकल प्रोफेशन के प्रतिनिधि ही शामिल थे। क्‍लब के अध्‍यक्षों में तमाम वायसराय और गर्वनर जनरल शामिल थे जिनमें मेटकाफ, कोलविले, ग्रांट, कॉटन, आउट्राम आदि थे। 1842 से 1844 तक भारत के गर्वनर जनरल लॉर्ड एलनबोरो और 11 वर्षों तक सर चार्ल्‍स मेटकाफ इसके अध्‍यक्ष रहे।

क्‍लब की शुरुआत चौरंगी में दो मंजिला किराए की बिल्डिंग से हुई थी। फिर वहां से ये एसप्‍लेनेड और बाद में टैंक स्‍क्‍वायर तक पहुंच गया। 1845 में क्‍लब उस जगह स्‍थानांतरित किया गया जहां लॉर्ड मैकाले सुप्रीम काउंसिल के लॉ आफिसर के रूप में भारत में 1834 से 1838 तक रहे थे। ये इमारत प्रख्‍यात बंगाली लेखक काली प्रसन्‍ना सिन्‍हा की थी। 1907 में क्‍लब एक लिमिटेड कंपनी के रूप में पंजीकृत हुआ। मगर बड़े खेद की बात है कि इस भव्‍य इमारत को क्‍लब की सख्‍त सदस्‍यता नीति के चलते खराब हुई आर्थिक हालत और एक हैरिटेज बिल्डिंग के प्रति प्रशासन की उदासीनता के कारण बचाया नहीं जा सका। क्‍लब कर्जे में डूब चुका था और इसे अपनी सामने की इमारत को छोड़ना पड़ा और आज ये क्‍लब रसेल स्‍ट्रीट पर क्‍लब की एनेक्‍सी में सिमट कर रह गया है। इतने उतार-चढ़ाव से गुज़रने के बावजूद भी आज भी क्‍लब अपने सुनहरे इतिहास के साथ अपना सफर तय कर रहा है।  
इसके आज तक जीवित रहने की एक वजह भी है, क्‍लब ने समय के साथ स्‍वयं के नियम और कायदों में बदलाव किया। देश की राजधानी के दिल्‍ली स्‍थानां‍तरित हो जाने के बाद फौज और प्रशासन के आला अधिकारी तो दिल्‍ली चले गए थे इसलिए अब क्‍लब ने वरिष्‍ठ व्‍यापारिक लोगों, कानून, मेडिकल और अन्‍य व्‍यवसायों के लोगों को क्‍लब में एंट्री देना शुरु कर दिया। 1947 में बंगाल का विभाजन होने के बाद क्‍लब के नाम को लेकर सवाल उठा लेकिन तत्‍कालीन बंगाल के गर्वनर सर सी. राजगोपालाचारी के सुझाव पर इसका नाम यही रहने दिया गया।
आश्‍चर्य की बात ये है कि केवल 1959 में ही भारतीयों को इस क्‍लब में प्रवेश की इजाज़त मिली और महिलाओं को 1990 में। क्‍लब का सख्‍त ड्रेस कोड भी समय के साथ-साथ बदलता रहा मगर आज भी इसका सख्‍ती से यहां पालन किया जा रहा है। मसलन पहली मंजिल पर ओरिएंटल हॉल में लोग केवल फॉर्मल ड्रेस में ही जा सकते हैं, चप्‍पल, स्लिपर्स और जींस पेंट पहनने की इजाज़त नहीं है। एक रात डिनर के वक्‍़त मुझे भी सैंडल पहने होने के कारण ऑरिएंटल हॉल से लौटना पड़ा। शुरु में थोड़ा अजीब लगा मगर परंपरा और कायदे का मैं भी मुरीद रहा हूं सो शेष दिनों में इसका पालन किया। हां, इसका एक फायदा भी हुआ। नीचे ग्राउंड फ्लोर पर चाइनीज रेस्‍त्रां में लजीज चाइनीज भोजन का जमकर लुत्‍फ़ लिया। वहां किसी प्रकार का ड्रेस कोड नहीं है। 


क्‍लब का खान-पान दूर देशों तक मशहूर है। यहां सदस्‍यों की पसंद के हिसाब से व्‍यंजनों की एक लंबी फेहरिस्‍त हर वक्‍़त उपलब्‍ध रहती है। बंगाल में हों और बंगाली खाना न खाया तो क्या खाया? सो क्लब में बंगाली बफे ने ये हसरत भी पूरी कर दी। बेगुनी, बंगाली परोठा, कोफ्ते, पंचसब्ज, घी-चावल और सबसे खास वो मीठी चटनी जिसका कोई मुकाबला नहीं। हिन्दुस्तान के जायके और स्वाद भी अनुपम हैं...एक भारतीय के लिए ही सभी से परिचय हो पाना मुश्किल है तो किसी विदेशी मेहमान का अभिभूत हो जाना स्वाभाविक ही है। अतिथियों की सेवा और खान-पान की बड़ी बारीकी से देख-रेख कर रहे शकील खान साहब से एक रोज रात के खाने पर तफ़सील से क्‍लब के बारे में बात हुई। शकील खान के वालिद यहां बरसों पहले आए थे और उनके बाद खुद शकील यहीं के होकर रह गए और अब उन्‍होंने अपने ग्रेजुएट बेटे को भी यहीं काम पर लगा दिया है। शकील खान का पुश्‍तैनी घर वाराणसी के पास है जहां वे बीच-बीच में जाते रहते हैं। बकौल शकील इस क्‍लब में उन्‍होंने कलकत्‍ता की नामचीन हस्तियों को उनकी पसंद का खाना खिलाया है। शकील सच ही कह रहे थे क्‍योंकि उस वक्‍़त मेरी टेबल पर जो खाना परोसा गया था वो खुद बात की गवाही दे रहा था। यहां जो दही बनाई जाती है वैसी मैंने अब तक कहीं नहीं खाई थी। शकील ने बताया कि एक ग्‍वाला रोज दूध लेकर यहां इसे मिट्टी के बर्तनों में जमा कर जाता है। अब वो इसमें और कया जादू करता है ये क्‍लब का अपना सीक्रेट है। शकील साहब से जब मैंने इस क्‍लब के इतिहास के बारे में कुछ जानना चाहा तो एक अजीब सा दर्द उनके चेहरे पर उभर आया। शकील बोले कि साहब एक वक्‍़त था जब इंडियन्‍स को इस क्‍लब के आस-पास फटकने की भी इजाज़त नहीं थी, गोरे लोग भारतीयों के साथ कुत्‍तों जैसा व्‍यवहार करते थे। अपने देश की गुलामी के इतिहास से मैं खूब वाकिफ था। फिर थोड़ी ही देर में उनके चेहरे पर मुस्‍कुराहट लौट आई और बोले कि अब सब बदल गया है सिवाय साहिबी तौर-तरीकों और ड्रेस कोड़ के। उन्‍होंने एक ही सांस में क्‍लब के मौजूदा नामचीन सदस्‍यों के नाम गिनवा दिए जिनमें से मुझे बाद में सौरव गांगुली और कपिल देव का नाम ही याद रहा।

इतिहास में ये क्‍लब वायसराय, कमांडर इन चीफ, गर्वनरों, प्रधानमंत्रियों और मुख्‍य मंत्रियों के मिलने जुलने की खास जगहों में से एक था। 183 साल पुराने इस क्‍लब में आज भी उस दौर की हवा महसूस की जा सकती है। एक सदी पुराने नागराज बार में खनकते वाइन ग्‍लास आज भी उसी दौर की याद दिलाते हैं। यहां तक कि यहां लकड़ी के स्‍टूलों को भी नहीं बदला गया है। क्‍लब की सभी मंजिलों पर गलियारों में उस दौर के कलकत्‍ता की तस्‍वीरों को बड़े करीने से फ्रेम कर लगाया गया है जो एक तरह से विंटेज तस्‍वीरों की एक प्रदर्शिनी ही बन गई है। पुरानी लिफ्ट, रेड कार्पेट सीढीयां, ओरिएंटल हॉल के आदमकद पोट्रेट, तमाम एंटीक वस्‍तुएं सब मिलकर एक जादुई माहौल तैयार करते हैं जिसमें हम समय में यात्रा करते हुए प्रतीत होते हैं। 

हां, एक खास बात जो हर विजिटर को कौतुहल में डालती है वो है यहां चारों तरफ कोबरा का प्रतीक चिन्‍ह होना। क्‍लब के नागराज बार से लेकर क्‍लब के फर्श, यहां के बर्तनों, प्‍लेटों और कपड़ों तक पर ये निशान रहस्‍यमयी सा नज़र आता है। मेरे रूम के बार ड्यटी पर तैनात एक कर्मचारी से मैंने इस बारे में पूछा तो उसने कहा कि सर, इस बारे में पक्‍का तो नहीं पता मगर ऐसा सुना है कि जब क्‍लब की आधारशिला रखी जा रही थी तो पत्‍थर को रखने के लिए खोदे गए गड्ढ़े से एक कोबरा बाहर निकल आया। पूजा करा रहे पुजारी ने कहा कि इस सर्प को दूध दिया जाए और आधारशिला केवल तभी रखी जाएगी जब ये सर्प दूध को स्‍वीकार कर ले। ऐसा ही हुआ...सर्प ने दूध ग्रहण किया और इसी के बाद यहां नागराज बार का नाम पड़ा और ये निशान क्‍लब का ऑफिशियल एम्‍बलैंम बन गया।
क्‍लब का हर कौना और तमाम कमरे इतिहास के कई महत्‍वपूर्ण पड़ावों की आज भी याद दिलाते हैं। मसलन 1927 में यहां क्‍लब का शताब्‍दी वर्ष मनाया गया और 1977 में 150वां। इस 150 वें वर्ष के समारोह के लिए शानदार प्राइवेट डाइनिंग रूम, रूम 150 को सजाया गया। बाद में, कलकत्‍ता के 300 वें वर्ष को मनाने के लिए रूम 300 का नामकरण किया गया। आज भी हर साल 1 फरवरी को द बंगाल क्‍लब फाउंडर डे मनाया जाता है।
इस क्‍लब में ठहराना अपने आप में इतिहास के एक हिस्‍से की एक मुकम्‍मल यात्रा था। 





Sunday, 31 July 2016

जब बरसता है सिटी ऑफ जॉय...When City of Joy Rains !

मानूसन के दिल्‍ली आने का वक्‍़त हो चुका था. दिल्‍ली के लोग बारिश की बूंदों के शामियाने में चलने के लिए बेताब हो रहे थे और मानसून था कि बस आंय-बांय देने में जुटा था. जुलाई का दूसरा सप्‍ताह खत्‍म होने को था और दिल्‍ली में गर्मी अपना रौद्र रूप धरे हुए थी. रोम रोम से फूटती पसीने की गंगा में मानो शरीर रोज कई बार डूबता और राहत की बूंदों के लिए तड़फता. इधर ब्‍लॉगिंग की दुनिया में मानसून की और भी अधिक शिद्दत से प्रतीक्षा की जा रही थी. उन भीगी और सुहावनी तस्‍वीरों की बात ही कुछ और होती है. इस वक्‍़त कोई पहाड़ों की ओर यात्रा पर निकले तो समझ आता है. मगर हमारी किस्‍मत हमें गर्मी और उमस के लिए बदनाम कोलकाता ले जा रही थी. कोलकाता और बारिश का अब तक इतना ही कनेक्‍शन समझा जाता था कि बारिश में ये शहर और भी अधिक अस्‍त व्‍यस्‍त और गंदा हो जाता है. मगर कुछ तो होगा यहां जो इसे ‘सिटी ऑफ जॉयकहा जाता है. सच मानिए पिछले सात-आठ सालों में कोलकाता तेजी से बदला है. हां, महानगरीय जीवन की समस्‍याएं अभी भी वहां हैं मगर बारिश अब इस शहर की जिंदगी को दूभर नहीं बनाती. हम जिस दिन कोलकाता पहुंचे रिमझिम फुहारों ने हमारा स्‍वागत किया और चार दिन की यात्रा के अंतिम दिन कोलकाता छोड़ते वक्‍त मूसलाधार बारिश ने हमें विदा किया. कोलकाता में घूमते-टहलते अपने मोबाइल में कुछ तस्‍वीरें कैद कर लीं. कोलकाता में बारिश की चंद बूंदें पड़ते ही शहर की तासीर ही बदल जाती है....सब कुछ सुहावना, उमस भरी यंत्रणा से जैसे एक पल में मुक्ति.....तब बनता है आमार सोनार बांग्‍ला।! ये तस्‍वीरें मुझे उस हसीन कोलकाता की हमेशा याद दिलाएंगी
हावड़ा ब्रिज हावड़ा और कोलकाता को आपस में जोड़ता है और इस सिटी ऑफ जॉय से हमारी मुलाकात कराता है. इस ब्रिज से जब हम गुज़रे तो ऊपर से बारिश की फुहारों ने स्‍वागत किया. 



ये तस्‍वीर मैंने जतिनदास पाार्क मेट्रो स्‍टेशन के बाहर खींची थी. 
हावड़ा ब्रिज तो जैसे कोलकाता की शान है दूर से हमेशा अपनी ओर बुलाता सा नज़र आएगा....कोलकाता प्रवास के दौरान कई दफ़ा इससे गुज़रना हुआ और जब भी गुज़रे मानसून बस इसके ऊपर से अपना प्‍यार बरसाता नज़र आया.  

बारिशें जहां शहर के बाशिंदों के लिए राहत की सांस लेकर आती हैं वहीं सड़क पर काम धंधे के लिए निकले लोगों के लिए थोड़ी तकलीफ़ें भी. मैं सुबह के नाश्‍ते की तलाश में कोलकाता में मुख्‍यमंत्री के आवास के पास से गुज़र रहा था तो बारिश से लगे जाम में दूसरी और कोलकाता की आइकॉनिक पीली टैक्‍सी चमक रही थी. अपनी कार की खिड़की से मैं देर तक उस ड्राइवर को देखता रहा और फिर जाम से निकलने की जुगत भिड़ाते उस ड्राइवर की तस्‍वीर लेनी ही पड़ी. पीली टैक्‍सी तो जैसे कोलकाता की लाइफ-लाइन है.

ये दोपहर का वक्‍़त था. क्‍लब से दोपहर का खाना खाकर हम पार्क स्‍ट्रीट की ओर निकले. एक सिग्‍नल पर गाड़ी रुकी तो मेरी दांई ओर मुझे एक बहुत पुरानी इमारत नज़र आई जिस पर गुज़रा वक्‍़त अपनी छाप खूब छोड़ कर गया था. खंडहर होती इमारत से भी जिंदगी फूट रही थी ...कि तभी एक बुजुर्ग बारिश में छाता लेकर उधर से गुज़़रे. कैमरा को जैसे उसका सब्‍जेक्‍ट मिल गया था. जो तस्‍वीर बनी वो बता रही थी गुज़रता वक्‍त न सिर्फ इमारतों बल्कि इंसानों पर भी अपना असर करता है. चीजें बदलती हैं, पहले जैसी नहीं रहतीं ....मगर फिर भी जिंदगी जीने का हौसला बनाए रखती है. 
इस तस्‍वीर को सुप्रसिद्ध ब्‍लॉगर प्रसाद जी ने अपने ब्‍लॉग Desi Traveller पर http://desitraveler.com/chasing-monsoon-travel-bloggers-chase-monsoon/ नाम से एक अनूठी पोस्‍ट में शामिल किया है. जिसमें दुनिया भर के 25 ट्रैवल ब्‍लॉगर्स ने अपनी मानसून की ताजा खींची गई तस्‍वीरों को साझा किया है. 


नीचे की तस्‍वीर 'द बंगाल क्‍लब' के मेरे कमरे की खिड़की से खींची गई है. उस रोज अल सुबह कमरे से बाहर बारिश की आवाज ने नींद खोल दी. खिड़की पर बारिश की बूंदें टकरा कर आवाजें जो लगा रही थीं. मैंने उठ कर खिड़की के उस पार झांका तो बस देखता ही रह गया. खिड़की के बाहर सड़़के उस पार वाली इमारत जैसे पानी में बही जा रही हो. मुझे बारिश की कारिस्‍तानी और अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ. बारिश में गज़ब का जादू है ये असली को नकली और नकली को असली बना कर दिखा सकती है. 

ये तस्‍वीर भी उसी सुबह की है...चाय की चुस्‍की लेते लेते अपने रूम से जुड़ी बैठक की खिड़की खोली तो बारिश अभी भी हो रही थी. सामने की इस बड़ी इमारत में लोग काम पर जाने की तैयारी करते नज़र आ रहे थे. एक भीगे से दिन में सुबह की भाग-दौड़ अलग ही होती है. 


आज कोलकाता में आखिरी दिन था. हमें ट्राम की सवारी करनी थी सो ड्राइवर ने हमें धरमतल्‍ला छोड़ दिया और वो खिदिरपुर जाकर हमारा इंतजार करने लगा. ट्राम की यात्रा कर हम वापस अपनी गाड़ी में पार्क स्‍ट्रीट की ओर बढ़ने लगे. कोलकाता में स्‍ट्रीट फूूड़़ की कोई कमी नहीं....आप जिधर नज़र घुमाएंगे नुक्‍कड़ों और पटरियों पर आपको सैकड़ों ठिए और गुमटियां नज़र आ जाएंगे. यही आलम कोलकात की सुबहों का भी है. कोलकाता के इन अड्डों पर गरीब से गरीब आदमी के लिए भी सस्‍ता भरपेट भोजन आसानी से मिल जाता है. 


विक्‍टोरिया मैमोरियल को बारिश में देखने का अलग ही मजा है. मैं जिस वक्‍़त इस एतिहासिक इमारत को देख रहा था...बारिश तो नहीं ही हुई मगर काले बादलों ने लगातार इस इमारत के आस-पास डेरा डाले रखा. 


धरमतल्‍ला के नज़दीक एक व्‍यस्‍त चौराहा. यहीं पास ही केसी दास के मशहूर रसगुल्‍लों की दुकान भी है. 




सियालदाह स्‍टेशन छोड़ते ही ट्रेन से खूब हरे भरे ट्रैक और दृश्‍य दिखने लगते हैं. सियालदाह के बाद दुर्गापुर तक हमें जमकर हरियाली देखने को मिली. ये रास्‍ता अपनी खूबसूरती के लिए यूं भी बहुत मशहूर है. ये कोलकाता में खींची गई आखिरी तस्‍वीर थी. 

Wednesday, 18 May 2016

वााद्य यंत्रों का अनूठा मैलोडी वैक्‍स म्‍यूजियम - Melody Wax Museum with Musical Instruments

दुनिया में नायाब चीजों और धरोहरों को सहेज कर रखने के शौक ने संग्रहालयों को जन्‍म दिया. पूरी दुनिया में न केवल सरकारें और संस्‍थाएं बल्कि लोग भी अकेले ही अपने दम पर कलाओं, वस्‍तुओं और शिल्‍प को संग्रहालयों में सहेजते आ रहे हैं. मैं अब तक देश के विभिन्‍न राज्‍यों में तमाम संग्रहालयों का दौरा कर चुका हूं जहां हमारी लोक कलाएं, परिधान, उत्‍खनन से निकली वस्‍तुएं, युद्धों में इस्‍तेमाल किए जाने वाले हथियार, औजार, सिक्‍के, मिट्टी के बर्तन, आभूषणों आदि को उनके ब्‍यौरे के साथ बड़े प्‍यार से जगह दी गई है. इंसान की संग्रहालयों के लिए ये कवायद इसलिए है ताकि उसकी आने वाली पीढि़यां अपने इतिहास को और मानव सभ्‍यता के विकास क्रम को अपनी आंखों से देख कर महसूस कर सकें.

आज विश्‍व संग्रहालय दिवस पर मैं आपसे एक खास संग्रहालय की बात करना चाहता हूं जो दुनिया भर में शायद अपनी तरह का एकमात्र संग्रहालय है. मैं बात कर रहा हूं कर्नाटक के मैसूरू में मैलोडी वैक्‍स म्‍यूजियम की. मैलोडी इसलिए कि यहां दुनिया भर के म्‍यूजिकल इंस्‍ट्रूमेंट्स को प्रदर्शित किया गया है और वैक्‍स इसलिए कि इन म्‍यूजिकल इंस्‍ट्रूमेंट्स को बजाते हुए दिखाए गए लोग वैक्‍स से बनाए गए हैं. इस संग्रहालय की स्‍थापना 2010 में बैंगूलूरू के एक आईटी प्रोफैशनल श्रीजी भास्‍करन ने पूरी दुनिया के संगीत के प्रति सम्‍मान व्‍यक्‍त करने के लिए की थी।


मैंने इससे पहले सिर्फ लंदन के मैडम तुसाद वैक्‍स म्‍यूजियम से ही परिचित था. क्‍या खूब शौहरत पाई है मैडम तुसाद के म्‍यूजियम ने कि दुनिया का ताकतवर इंसान भी वहां खुद को मौम के पुतले के रूप में देखना चाहता है. वहां प्रेसीडेंट ओबामा अपनी मधुर मुस्‍कान लिए मौजदू है तो अब हाल ही में हमारे प्रधानमंत्री जी नरेन्‍द्र मोदी भी दुनिया की उन मौम से बनी नामचीन हस्तियों के बीच शामिल हो गए हैं.

खैर हम मैसूर के मैलोडी वैक्‍स म्‍यूजियम की बात कर रहे थे. इस म्‍यूजियम में कुल 19 गैलरियां मौजूद हैं जिनमें तकरीबन 110 आदम कद वैक्‍स के पुतले हैं और 300 से अधिक इंडियन और वैस्‍टर्न म्‍यूजिकल इंस्‍ट्रूमेंट्स दर्शकों का स्‍वागत करते हैं. कमाल की बात ये है कि अमूमन हर गैलरी में इन पुतलों और इंस्‍ट्रूमेंट्स को अलग-अलग बैंड और स्‍टेज पर परफॉर्म करते हुए दिखाया गया है जो अपने आप में एक प्रस्‍तुति को देखने का अहसास देता है. संगीत की इस वैक्‍स यात्रा में पाषाण युग से लेकर आज के आ‍धुनिक म्‍यूजिकल इंस्‍ट्रूमेंट्स मौजूद हैं. कुछ शानदार गैलरियों में इंडियन क्‍लासिकल हिंदुस्‍तानी और कारनाटिक, जैज, रॉक, भांगड़ा, हिप-हॉप, मध्‍य-पूर्व, दक्षिण भारतीय, चीनी आदि यहां तक कि कुछ एन्‍क्‍लोजर जनजातीय संगीत को भी दर्शाते हैं.


संगीत के वाद्य यंत्रों से सजी इन गैलरियों में संगीत से इतर सामाजिक संदेश देते हुए कुछ दृश्‍य बहुत आकर्षित करते हैं मसलन भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में गरीब और अमीर के बीच बढ़ती खाई. इनके अलावा मैसूर के पूर्वराजा नालवाडी कृष्‍णाराजा वाडियार का शानदार स्‍टैच्‍यू भी इस म्‍यूजियम की शान बढ़ा रहा है.


मैलोडी वर्ल्‍ड श्रीजी भास्‍करन की अनुपम कृति है हालां‍कि इससे पहले वे ऊटी में 2007 में पहला और 2008 में ओल्‍ड गोवा में दूसरा वैक्‍स म्‍यूजियम खोल चुके हैं और उनकी कुछ रचनाएं देश के अन्‍य वैक्‍स म्‍यूजियम की शान बढ़ा रही हैं। वैक्‍स म्‍यूजियम की हर रचना श्रीजी भास्‍करन की मेहनत और हुनर की खुद गवाही देती है.



वैक्‍स से स्‍टैच्‍यू बनाने की प्रक्रिया बेहद पेचीदा है जिसमें कई स्‍तरों पर कलाकारी की जरूरत है. इसमें कम्‍प्‍यूटर से इमेजिंग, मोल्डिंग और स्‍कल्‍पटिंग आदि शामिल हैं. एक-एक वैक्‍स स्‍टैच्‍यू को बनाने के लिए लगभग 50 किलो तक वैक्‍स की जरूरत होती है और केवल एक ही स्‍टैच्‍यू को बनाने में ही लगभग 2 से 4 महीने का समय लग जाता है. ये काम कम खर्चीला भी नहीं है...कलाकृति की जरूरत और काम की बारीकी के हिसाब से एक वैक्‍स स्‍टैच्‍यू पर 3 से 15 लाख रु. तक का खर्च आ जाता है. स्‍टैच्‍यू तैयार होने के बाद उन्‍हें वास्‍तविक दिखने के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है....रियल लाइफ लुक देने के लिए असली दिखने वाले दांत, बाल और आंखों का होना बहुत जरूरी है और साहब ये यकीनन बहुत टेढ़ा काम है. बात यहीं खत्‍म नहीं होती है...इन मौम के पुतलों के लिए कपड़े भी उनके नाप के सिलवाने पड़ते हैं. तब कहीं जाकर लाइफ-साइज स्‍टैच्‍यू तैयार होते हैं. इस सब से हम समझ सकते हैं कि एक आर्टिस्‍ट के लिए ये काम कितने धैर्य, समर्पण और रुचि का है.

म्‍यूजियम में घूमते हुए एक गैलरी में एक बोर्ड पर मेरी निगाह पड़ी. जिस पर लिखा था कि कनार्टक टूरिज्‍म ने इस म्‍यूजियम को रिकोग्‍नाइज नहीं किया है जबकि गोवा टूरिज्‍म ने इस संग्रहालय को रिकोग्‍नाइज किया हुआ है. इस संग्रहालय से जुड़े लोगों का दर्द वाजिब है. म्‍यूजियम के रख-रखाव और स्‍टाफ का खर्च टिकटों की बिक्री से चल रहा है. यदि इसे थोड़ा-बहुत सरकारी संरक्षण प्राप्‍त हो जाए तो ये संग्रहालय और अधिक पर्यटकों को आकर्षित कर सकता है. अभी तक तो ट्रिप एडवाइजर या ब्‍लॉग आदि पर पढ़ कर ही लोग यहां तक पहुंच रहे हैं.  मौम के पुतलों का ये संसार एक बार देखने लायक तो जरूर हैै और अगर आप संगीत प्रेमी हैं तो ये देखना और भी जरूरी हो जाता हैै. 







दर्शकों के लिए:

समय: ये म्‍यूजियम सुबह 9.30 से शाम 7.00 बजे तक खुलता है.
टिकट: 30 रुपए
स्टिल कैमरा फीस : 10 रु.

पता: विहार मार्ग, सिद्धार्थ ले आउट, मैसूरू