यायावरी yayavaree

Thursday, 23 November 2017

India International Trade Fair: Reopening of a Magic Box

अंतरराष्‍ट्रीय व्‍यापार मेला: जादू के पिटारे का फिर से खुलना। 

दिल्‍ली के प्रगति मैदान में वो जादू का पिटारा ट्रेड फेयर एक बार फिर खुल गया है। वही पिटारा जिसमें दुनिया जहान का बाज़ार खुद-ब-खुद सिमट कर चला आता है। हममें से बहुतों के बचपन की यादें इस मेले से जुड़ी हैं और हम आज भी हर साल ट्रेड फेयर के दौरे के साथ उन यादों से कुछ धूल साफ़ करने की कोशिश जरूर करते हैं। दिल्‍ली और आस-पास के इलाके के परिवारों के लिए तो ट्रेड फेयर की विजिट साल का अनिवार्य अनुष्‍ठान रहा है। चाहे कुछ न खरीदना हो फिर भी एक बार देखने जाना जरूरी है। बचपन में जब एक बार ऐसे ही मेले में किसी ने बताया कि ये दुकानें और साजो-सामान हर साल सिर्फ कुछ दिनों के लिए ही यहां होते हैं तो मन यकीन नहीं कर पाया। ऐसा कैसे हो सकता है? इतना बड़ा बाजार, इतनी दुकानें, इतना सामान कैसे कहीं जा सकता है? मेला मेरे लिए चंद्रकांता के तिलिस्‍म जैसा हो गया था। फिर हम बड़े हो गए और रहस्‍य समझ आने लगा मगर मेले का तिलिस्‍म कुछ हद तक अभी भी बरक़रार है। 
14 से 27 नवंबर तक चलने वाले ट्रेड फेयर के पहले चार दिन कारोबारियों के लिए रखे गए थे और उसके बाद 18 तारीख से यह मेला आम जनता के लिए खुल गया है। मैं हर बार खूब भीड़ भडक्‍के के बीच मेला देखता रहा हूं मगर इस बार मुझे तीसरे दिन बिजनेस आवर्स में यह मेला देखने का अवसर मिला। सो तसल्‍ली से लोगों से बात करने का मौका भी मिला। इस बार मेले की थीम है- स्‍टार्ट अप इंडिया-स्‍टैंड अप इंडिया हर राज्‍य के पैवेलियन में नया प्रयोग करने वाले स्‍टार्ट अप को मौका दिया गया है। ये एक अच्‍छी शुरूआत है। 

हॉल नंबर 18

मगर इस बार मेले की शक्‍लोसूरत काफ़ी हद तक बदली नज़र आ रही है। दरअसल मेला क्षेत्र के बड़े हिस्‍से में निर्माण कार्य चल रहा है और राज्‍यों के पैवेलियनों को उनके स्‍थाई ठिकानों की जगह विशायकाय हैंगरों में जगह दी गई है। इसलिए हर बार की तरह राज्‍यों की भव्‍य सजावट देखने को नहीं मिल पा रही है। लेकिन इसके बावजूद मेले का तिलिस्‍म कम नहीं है। जिन्‍होंने एक बार भी ये मेला नहीं देखा हो उनसे मेरा कहना है कि वक्‍़त निकाल एक बार जरूर जाएं। अगली बार मेला अपने आप आपको बुला लेगा।
प्रगति मैदान मैट्रो स्‍टेशन के निकट गेट नंबर 10 से मेले में घुसने के बाद 12 नंबर हॉल के बाहर सीआरपीएफ का पैवेलियन मेरा ध्‍यान खींचता है। देश की सुरक्षा में सीआरपीएफ का योगदान ज्‍यादातर अनकहा और अनसुना ही रहा है। यहां सीआरपीएफ ने बड़े सलीके से अपने जवानों की बलिदान गाथा को प्रदर्शित किया है। इसी के साथ तमाम हथियारों और ऑपरेशनों की जानकारी आने वालों को मुहैया कराई जा रही है। मौके पर मौजूद जवान बड़े इत्‍मीनान से सवालों के जवाब दे रहे हैं। कुछ पल वहां गुजारने के बाद मैं हॉल नंबर 12 की ओर बढ़ चला। हॉल में घरेलू सामानों से जुड़े ब्रांड और कारोबारियों के स्‍टॉल मौजूद हैं। लगभग हर बड़ा ब्रांड यहां मौजूद है। जूतों, कॉस्‍मेटिक्‍स, चाय, इलैक्‍ट्रॉनिक्‍स और घरेलू उपयोग की चीजें यहां देखी और खरीदी जा सकती हैं। हाजमोला वालों ने सर्दी और खांसी से निजात के लिए एक खास तरह की चाय बाजार में उतारी है। 12 नंबर हॉल में पिछली तरफ है स्‍टॉल ....मुफ्त में टेस्‍ट कीजिएगा।
इस हाल का जायजा लेने के बाद मैंने हॉल नंबर 18 का रुख किया। यहां तमाम विदेशी कारोबारी ग्राउंड फ्लोर पर अपने नायाब और बेहद खूबसूरत साजो सामाने से लोगों को लुभा रहे हैं। वहीं ऊपर की ओर चूरण-चटनी, गजक, गुड़ और घी-तेल के तमाम देसी ब्रांड आपको ललचाने के लिए बैठे हैं। यहीं मुझे धामपुर का गुड़ मिल गया। एकाध बार पहले भी लिया है....एकदम शुद्ध और स्‍वाद से भरा। टेस्‍ट के लिए ही सही दो-चार पीस ले लीजिएगा। घूमते-घुमाते मधुसूदन घी का स्‍टाल दिख गया। दिल्‍ली के बाजारों में उपलब्‍ध तमाम घी के बीच यही एक घी मुझे अभी तक ठीक-ठाक लगा है। गाय का घी डिस्‍काउंट पर 450 रुपए किलो के भाव मिल रहा है। ट्राई कर सकते हैं। लेकिन हां,  घी लौटते वक्‍़त ही खरीदिएगा वरना पूरा मेला घी हाथ में उठाए-उठाए देखना पड़ेगा। और घी ही क्‍या साहब, आप 18 नंबर हॉल को ही आखिर के लिए रख छोडिए। पहले मेला घूमिए....तमाम और स्‍टॉल और विभिन्‍न राज्‍यों के हैंगर देखिए और आखिर में हॉल नंबर 12, 11, 10 और 18 को रखिए। आपकी असल खरीदारी यहीं होगी। इन तीन हॉल के लिए ही कम से कम 3 घंटा हाथ में रखिएगा।
मैं यहां से निकल कर हॉल नंबर 7 के बाहर खुले में सजी नेशनल जूट बोर्ड की दुकानों से होकर गुज़रा। ये वस्‍त्र मंत्रालय के अंतर्गत आने वाला विभाग है। यहां आपको जूट से बने आकर्षक थैले, खिलौने और सजावटी सामान सस्‍ती दरों पर मिल सकता है। इन दुकानों के ठीक सामने ही हुनर हाट है जहां अल्‍पसंख्‍यक कार्य मंत्रालय के सौजन्‍य से हुनरमंद कलाकारों अपनी दुकानें सजाए हुए हैं। यहां ज़रदोज़ी, लखनऊ की चिकनकारी, खुर्जा की ब्‍लू पॉटरी, चन्‍नपट्टना के लकड़ी के खिलौने, जयपुर की लाख की चूडि़यां, जम्‍मू कश्‍मीरे का पेपर मैशे और महिलाओं की आर्टिफीशियल ज्‍वैलरी के तमाम स्‍टॉल यहां मौजूद हैं। दिलचस्‍प बात ये है कि यहां मौजूद तमाम कलाकार राष्‍ट्रीय स्‍तर पर अवार्ड पाने वाले कलाकार हैं। सो उनकी कला का मोल-भाव करते समय हम जरूरत से ज्‍यादा सख्‍त न हो जाएं। मैंने लोगों को यहां भी बहुत मच-मच करते देखा है। भाई आपको पसंद है तो लो नहीं तो छोड़ दो। हर चौथे स्‍टॉल पर हवा में फायर मत करो कि करोल बाग में 100 रुपए का मिलता है। ऐसे हवाई फायर पर दुकान से यही जवाब मिलेगा कि भाई जी, फिर करोल बाग से ही ले लीजिएगा
हॉल नंबर 9 में स्‍वास्‍थ्‍य और परिवार कल्‍याण मंत्रालय के पैवेलियन में एक अच्‍छा अनुभव हुआ। इस पैवेलियन में आपके ब्‍लड-प्रैशर, शुगर, बॉडी मास इंडेक्‍स और डेंटल केयर की अच्‍छी व्‍यवस्‍था की गई है। इसी तरह की व्‍यवस्‍था हॉल नंबर 14 में भी की गई है। एक छोटा सा फॉर्म भरिए और सारे टेस्‍ट 10 से 15 मिनट में निपट जाएंगे। यहीं मौजूद टीम में तमाम हॉस्‍पीटलों के डॉक्‍टर भी हैं जिनसे आप टेस्‍ट रिपोर्ट गड़बड़ आने पर परामर्श भी ले सकते हैं। सब कुछ नि:शुल्‍क है। मेरे बीपी की जांच कर रही लेडी हार्डिंग हॉस्‍पीटल की डॉक्‍टर से इस व्‍यवस्‍था के बारे में चर्चा की तो उन्‍होंने हंसते हुए बताया कि हम तो हर साल इसी तरह अपनी दुकान सजाते हैं, हमारे पास बेचने के लिए कुछ नहीं है मगर लोगों को उनके स्‍वास्‍थ्‍य के प्रति खूब जागरूक कर रहे हैं डॉक्‍टर के मुताबिक तमाम लोगों को यहां पहली बार टेस्‍ट कराने के बाद आई रिपोर्ट को देखकर झटका लगता है। दरअसल बड़े पैमाने पर लोग अपने स्‍वास्‍थ्‍य के प्रति लापरवाह हैं। जबकि ब्‍लड प्रेशर और शुगर जैसी छोटी दिखने वाली बीमारियों के प्रति बहुत सावधानी की जरूरत है। ऊपर वाले का शुक्र था कि मेरा बीपी और शुगर लेवल सामान्‍य आया। लेकिन डॉक्‍टर साहिबा के साथ चर्चा में कुछ और सावधानियों की हिदायत ताज़ा हो गई। नमक ज्‍यादा मत खाइए, एक्‍सरसाइज करते रहिए, नियमित जांच कराते रहिए, पानी खूब पिएं आदि आदि।

श्री अदिती नंदन
इसके बाद हैंगर 2 का जायजा लिया गया। यहां उत्‍तर प्रदेश, बिहार, छत्‍तीसगढ़, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, मेघालय समेत कुछ और राज्‍यों के पैवेलियन मौजूद हैं। मुझे बिहार राज्‍य के पैवेलियन में एक स्‍टार्ट अप आर्ट्ज इंडिया ने अपनी ओर खींचा। हैण्‍डीक्राफ्ट और हैण्‍डलूम को लेकर मेरे मन में हमेशा ख्‍याल रहा है कि इन क्षेत्रों में बहुत पोटेंशियल है अगर सलीके से काम किया जाए तो। आर्ट्ज इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्‍टर श्री अदिती नंदन और उनकी टीम के कुछ अन्‍य सदस्‍यों से इत्‍मीनान से बातें हुईं उनके कंसेप्‍ट और अनुभवों पर। उनका स्‍टार्ट अप दरअसल दूर-दराज के इलाकों में बैठे कलाकारों से सीधे संपर्क कर उनके बनाए उत्‍पादों को ग्राहकों तक पहुंचा रहा है। खास बात ये है कि वे औरों से अलग यहां, ग्राहक की पसंद के मुताबिक अपने डिजाइनरों से डिजाइन तैयार करवा कर उस डिजाइन के अनुसार कारीगरों से सामान तैयार करवाते हैं। इस काम में जरूरत पड़ने पर वे कारीगरों को छोटी-मोटी ट्रेनिंग भी देते हैं और कारीगरों के सामानों का अच्‍छा दाम उन्‍हें मुहैया करवाते हैं। फिलहाल उनका स्‍टार्ट-अप पांच से छह राज्‍यों में काम कर रहा है और भविष्‍य के लिए उनके सपनों को मैं उनकी आंखों में चमकते हुए देख पा रहा था। उधर दिल्‍ली राज्‍य के पैवेलियन में दिल्‍ली पर्यटन के स्‍टॉल के साथ ही तिहाड़ जेल के कैदियों द्वारा बनाए गए सामान बिक्री के लिए सजाए गए हैं। तिहाड़ के इस पहलू पर हम एक अलग पोस्‍ट में बात करेंगे।
मेले में जगह जगह सांस्‍कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जा रहा है। कुछ देर और यूं ही घूमते टहलते टांगे दर्द से जवाब देने लगीं तो मेले को अलविदा कह बाहर का रुख किया। हालांकि अभी कई और हॉल और हैंगर बाकी थे मगर सब कुछ एक दिन में देख पाना कहां संभव है। मौका लगा तो एक बार फिर आया जाएगा। हां, यहां मैं आपको एक लाख रुपए की टिप देना चाहूंगा...ध्‍यान से नोट कर लीजिए। यदि मेला देख कर आप वापिस मैट्रो से लौटना चाहते हैं तो गलती से भी भूल कर गेट नंबर 1 से बाहर मत निकलिएगा। यही गलती मैंने की थी। इस बार मेले के अंदर का भूगोल बिगड़ा हुआ था सो बाहर निकलते वक्‍़त धोखा हो गया। गेट नंबर एक से बाहर निकलने पर लगभग 2 किलोमीटर घूम कर ही आप प्रगति मैदान मैट्रो स्‍टेशन पहुंच पाएंगे। इसलिए मैट्रो के लिए वापसी गेट नंबर 10 या 7 और 8 से करें।
14 से 27 नवंबर, 2017
समय: प्रात: 9.30 बजे से सांय 7.30 बजे

टिकट मूल्‍य: सोमवार से शुक्रवार 60 रुपए, शनिवार और रविवार: 120 रुपए (टिकटें आईटीपीओ की वेबसाइट से ऑनलाइन भी खरीदी जा सकती हैं) याद रहे कि मेले में प्रतिदिन केवल 60,000 लोगों को ही प्रवेश दिया जा रहा है इसलिए समय से पहुंचें। हालांकि अब आप शाम 7.30 बजे तक भी प्रवेश कर सकते हैं।  
बाकी कहानी तस्‍वीरों की जुबानी यहां सुनिए....

सीआरपीएफ का पैवेलियन

सीआरपीएफ का पैवेलियन

इस्‍तांबुल का सजावटी सामान

इस्‍तांबुल का सजावटी सामान




चन्‍नपटना के लकड़ी के खिलौनेे



तिहाड़ की कारीगरी 

राजस्‍थान की चूडियां

खुर्जा की ब्‍लू पॉटरी







भदोही के कालीन








धामपुर का गुड





नेशनल जूट बोर्ड 



यहां तक सब्र से पढ़ने का बहुत शुक्रिया।  अपनी प्रतिक्रिया से मैसेज बॉक्‍स में जरूर अवगत कराएं और हां, वक्‍़त हो तो मेला देखने जरूर जाएं 😊  

Thursday, 2 November 2017

Shiraz: Restoration of a romance.

लौट कर आना एक खामोश मुहब्‍बत का 
Shiraz: A Romance of India 

लगभग 300 साल पुराने मुग़लिया सल्‍तनत के एक दिलचस्‍प किस्‍से पर भारतीय सिनेमा के शुरूआती दौर में 1928 में एक जर्मन-ब्रिटिश-भारतीय मूक फिल्‍़म बनती है और फिर इतिहास में गुम हो जाती है। ये किस्‍सा था सेलीमा (बाद में मुमताज़ महल) और शहज़ादे खुर्रम (बाद में शाहजहां), शिराज़ के इश्‍क और ताजमहल के बनने का। आज जब ताज़महल सवालों के घेरे में है, ऐसे वक्‍़त में Shiraz: A Romance of India  का ग्रैमी अवार्ड के लिए नामांकित हो चुकी अनुष्‍का शंकर जैसी विख्‍यात संगीतकार के संगीत से सज लौटना एक सुखद अनुभव है। इस असंभव को संभव बनाया है ब्रिटिश काउंसिल और ब्रिटिश फिल्‍म इंस्‍टीट्यूट (बीएफआई) नेशनल आर्काइव ने। फ्रांज़ ऑस्‍टन निर्देशित शिराज़: ए रोमांस ऑफ इंडिया फिल्‍म इन दिनों भारत और यूके के बीच लंबे संबंधों को सेली‍ब्रेट करने के लिए मनाए जा रहे यूके/इंडिया 2017 ईयर ऑफ कल्‍चर के कार्यक्रमों के हिस्‍से के रूप में 1 से 5 नवंबर के दौरान भारत के चार शहरों हैदराबाद, कोलकाता, नई दिल्‍ली और मुंबई का दौरा कर रही है। मगर सबसे दिलचस्‍प है 1928 की उस मूक फिल्‍म को अनुष्‍का शंकर के लाइव स्‍कोर के साथ देख पाना।
 
A still form Shiraz: A Romance of India
हाल ही में ब्रिटिश काउंसिल के सभागार में एक प्रेस सम्‍मेलन में अनुष्‍का शंकर ने इस फिल्‍म में दिए अपने संगीत के बारे में विस्‍तार से बात की। बकौल अनुष्‍का इस फिल्‍म के लिए लाइव स्‍कोर देना उनके लिए यक़ीनन एक चुनौती भरा काम था क्‍योंकि पूरी फिल्‍म में एक भी संवाद नहीं है और हर बदलते फ्रेम के साथ अलग तरह के संगीत की जरूरत थी। इस काम में जहां उन्‍होंने शास्‍त्रीय संगीत की मदद ली वहीं कुछ पश्चिमी साजों को भी साथ लिया है। पियानो, सेल्‍लो, सिंथेसाइज़र, बांसुरी, तबला, मृदंगम, घटम, मोर्सिंग और सितार की जुगलबंदी ने फिल्‍म में जान फूंक दी है और इस तरह कुल 8 संगीतकारों की टीम ने दिन रात एक करके इस काम को पूरा किया। अनुष्‍का कहती हैं कि उन्‍होंने, इस फिल्‍म में फिल्‍म की कहानी के समय, फिल्‍म के बनने के समय और आज के समय को मद्देनज़र रखते हुए संगीत को रचने की कोशिश की है और इस तरह ये इन तीनों का मिश्रण बन गई है। फिल्‍म में इस बात का खास ख्‍याल रखा है कि कहां खामोश रहना है और कहां धीमे संगीत की जरूरत है क्‍योंकि लोग फिल्‍म देखने आए हैं संगीत इसमें बाधा नहीं बनना चाहिए। बस कोशिश यही रही है कि दर्शकों को उस दौर के संगीत का अनुभव हो सके

Robin Baker on Restoration of film. Pic : Yayavaree
अनुष्‍का शंकर की उस प्रेसवार्ता के बाद मैंने किसी भी तरह इस फिल्‍म को देखने का फैसला कर लिया था। दिल्‍ली में इसका शो शुक्रवार 3 नवंबर को सिरी फोर्ट ऑडिटोरियम में होना है। जिसके टिकट बुक माई शो से खरीदे जा सकते हैं। मैंने टिकट खरीदने की कोशिश की तो पाया कि दिल्‍ली के शो के टिकट पहले ही बिक चुके हैं। खैर, मुझे किसी तरह यह फिल्‍म देखने को मिल गई। कुल 1 घंटा 40 मिनट की यह फिल्‍म वाकई न केवल भारतीय बल्कि विश्‍व सिनेमा की धरोहर है। ब्रिटिश फिल्‍म इंस्‍टीट्यूट के प्रमुख रोबिन बेकर कहते हैं कि, हम हर साल एक मूक फिल्‍म को रीस्‍टोर करते हैं मगर चूंकि यह फिल्‍म यूके और भारत के सांस्‍कृतिक संबंधों को रेखांकित करती है और क्‍योंकि आज कुछ ही भारतीय मूक फिल्‍में शेष बची हैं इसलिए शिराज़ पर काम करना सही निर्णय था। अब केवल ऐसी 20 भारतीय फिल्‍में ही बची हैं और उनमें से भी ज्‍यादातर अच्‍छी हालत में और पूरी तरह उपलब्‍ध नहीं हैं। शिराज़ के मामले में हमारी किस्‍मत अच्‍छी थी कि इस पूरी फिल्‍म के नेगेटिव हमारे पास मौजूद थे। इस फिल्‍म को रीस्‍टोर करने में इसे बनाने से ज्‍यादा वक्‍़त लगा आखिर ये एक 90 साल पुरानी फिल्‍म थी ये फिल्‍म भारतीय और पश्चिमी कलाओं और संवेदनाओं का अद्भुत मिश्रण है। शिराज़ को एक जर्मन निर्देशक, एक ब्रिटिश सिनेमेटोग्राफर, भारतीय लेखक ने मिलकर बनाया। पात्र भारतीय थे जिसमें शिराज़ की भूमिका उस वक्‍़त के मशहूर अभिनेता हिमांशु राय ने निभाई और सेलीमा की भूमिका इनाक्षी रामा राउ ने।

शिराज़ दरअसल निरंजन पाल के एक नाटक पर आधारित फिल्‍म है जो मुग़ल बादशाह द्वारा अपनी गुज़री बेग़म की याद में ताज़महल को बनवाने की रूमानी कहानी पर रौशनी डालता है। कहानी कुछ हद तक काल्‍पनिक है तो काफी हद तक हक़ीकत के करीब है। फिल्‍म के पहले दृश्‍य में तकरीबन 300 साल पहले पर्शिया के रेगिस्‍तान से गुज़रते एक कारवां पर हमले को दिखाया गया है। इस हमले से किसी तरह बच गई एक बच्‍ची को एक ग्रामीण कुम्‍हार अपने घर ले आता है ये बच्‍ची और कोई नहीं बल्कि राजकुमारी अर्जुमंद थी मगर इस सब से बेख़बर कुम्‍हार बच्‍ची का नाम नाम से‍लीमा रख देता है जो बाद में मुमताज़ महल के नाम से जानी गई। बाद में उस कुम्‍हार के बेटे शिराज़ और सेलीमा के बीच बचपन की दोस्‍ती धीरे-धीरे मुहब्‍बत में बदलती है। एक दिन सेलीमा का अपहरण कर उसे गुलाम के रूप में शहज़ादे खुर्रम (बाद में शाह-जहां) के आदमियों को बेच दिया जाता है। फिल्म हमें दिखाती है कि कैसे इतनी बड़ी हुकूमत के शहज़ादे को सेलीमा का प्‍यार पाने के लिए भी जद्दोज़हद करनी पड़ी। कहानी कुछ ऐेसे मोड़ लेती है कि सेलीमा भी खुर्रम को चाहने लगती है और उधर शिराज़ सेलीमा के इश्‍क में दीवाना हुआ जाता है। सेलीमा के लिए शिराज़ अपनी जिंदगी तक दांव पर लगा देता है और फिर....फिर क्‍या हुआ ये जानने के लिए तो आपको फिल्‍म ही देखनी चाहिए। ख़ैर एक रोज़ मुमताज़महल का इंतकाल होता है और उसके प्रेम में डूबा बादशाह उसके लिए एक यादगार मक़बरा बनवाना चा‍हता है। कलाकारों से सैकड़ों डिजाइन बनवाए गए मगर बादशाह को पसंद आया शिराज़ का बनाया ताज़महल। जो एक पाक़ मुहब्‍बत को समर्पित था।

ये अपने आप में रोचक बात है कि फिल्‍म की ज्‍यादातर शूटिंग आउटडोर लोकेशन्‍स पर की गई वो भी खासतौर पर आगरा और दिल्‍ली में। फिल्‍म को देखते वक्‍़त आगरा के किले और ताज़महल के हिस्‍सों को पहचाना जा सकता है। इस फिल्‍म के दो किस सीन बहुत चर्चित रहे। ये अपने आप में बड़ा हैरानी भरा था कि 1920 के दशक की एक फिल्‍म में कलाकार बड़ी बेतकल्‍लुफ़ी से चुंबन दृश्‍य दे रहे हैं। इससे ज़ाहिर होता है कि उस दौर में रोमांस को लेकर एक हद तक सिनेमाई सहज़ता थी। मगर फिर अचानक क्‍या हुआ.....हमें बाद के दशकों में वर्षों तक इस तरह का प्रसंग देखने को नहीं मिलता। ताज़महल पर हो रहे हमलों के बीच इस फिल्‍म के आने के समय को लेकर अनुष्‍का कहती हैं कि, ये केवल एक इत्‍तेफ़ाक़ है, मगर उन्‍हें खुशी है कि ये फिल्‍म ऐसे समय में सामने आ रही है'। वहीं बीएफआई के हैड क्‍यूरेटर बेकर कहते हैं कि, मैं उम्‍मीद करता हूं कि ये फिल्‍म लोगों को भारतीय सांस्‍कृतिक विरासत को समझने का एक नया दृष्टिकोण देगी

भारत में अपना दौरा खत्‍म करने के बाद शिराज़ जनवरी 2018 में यूके में सिनेमाघरों में रिलीज की जाएगी।
 
Robin Baker, Hear Curator, British Film Institute; Alan Gemmell OBE, Director British Council India; Anoushka Shankar, British Indian Sitar Player; Sir Dominic Anthony Gerard Asquith KCMG, British High Commissioner to the Republic of India
Shiraz: A Romance of India का प्रदर्शन नीचे दिए गए कार्यक्रमानुसार होगा:  

1 नवंबर - हैदराबाद इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर, हैदराबाद
3 नवंबर - संघटक कला मंदिर, कोलकाता
4 नवंबर - सिरी फोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली
5 नवंबर – श्रीशडमुखानंद चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती ऑडिटोरियम, मुंबई


इस बेहतरीन फिल्‍म को फिर से जि़ंंदा करने के लिए ब्रिटिश काउंसिल और बीएफआई शुक्रिया के हकदार हैं। यूके/इंडिया 2017 के बारे में अधिक जानकारी के लिए ब्रिटिश काउंसिल की वेबसाइट www.britishcouncil.in देखी जा सकती है।

About Anoushka Shankar: 
Anoushka Shankar.        Pic Courtesy: Anushka Menon

Deeply rooted in the Indian Classical music tradition, Anoushka Shankar studied exclusively from the age of nine under her father and guru, the late Ravi Shankar, and made her professional debut as a classical sitarist at the age of thirteen. By the age of 20, she had made three classical recordings and received her first Grammy® nomination, thereby becoming the first Indian female and youngest-ever nominee in the World Music category.

Through her bold and collaborative approach as a composer, Anoushka has encouraged cross-cultural dialogue whilst demonstrating the versatility of the sitar across musical genres. As a result, Anoushka has created a vital body of work with a prominent roster of artists such as Sting, M.I.A, Herbie Hancock, Pepe Habichuela, Karsh Kale, Rodrigo y Gabriela, and Joshua Bell.

#UKIndia2017 #Anoushkashankar #ShiraztheFilm #Britishcouncil #Britishcouncilindia 

Monday, 21 August 2017

अहंकार को मसालेदार ललकार है वीआईपी-2

फिल्‍म का एक दृश्‍य है जिसमें एक छोटी सी कंस्‍ट्रक्‍शन कंपनी में काम करने वाला नायक रघुवरन (धनुष) देश की सबसे बड़ी कंस्‍ट्रक्‍शन कंपनी की नौकरी के दिलकश ऑफर को ठुकराते हुए कहता है कि ‘मैं शेर की दुम बनने से ज्‍यादा बिल्‍ली का सिर बनना पसंद करूंगा। ये अकेला दृश्‍य फिल्‍म की कहानी के नीचे बह रहे अंडर करंट को परिभाषित करने के लिए काफी है। यहां अहंकार और बदमिजाजी का सामना ख़ुद्दारी और क़ाबिलियत से हो रहा है। नतीजा सभी जानते हैं... नायक की जीत तय है। मगर एक दर्शक के लिए यह देखना महत्‍पूर्ण है कि कहानी किन गलियों और नुक्‍कड़ों से होकर अपने अंत तक पहुंचेगी?

तमिल फिल्‍म ‘वीआईपी’ का सीक्‍वल है ‘वीआईपी-2’ जो हिन्‍दी में ‘वीआईपी-2 ललकार’ नाम से डब होकर आई है। फिल्‍म का नायक बेहद योग्‍य इंजीनियर है जिसकी सबसे बड़ी दौलत उसकी क़ाबिलियत और उस पर भरोसा करने वाले हज़ार इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स हैं। इन्‍हीं इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स के सहारे रघुवरन का सपना है अपनी कंपनी खड़ी करने का। एक छोटी सी कंपनी में इंजीनियरिंग की नौकरी करने वाले रघुवरन की कंस्‍ट्रक्‍शन की दुनिया की बेताज बादशाह वसुंधरा से ठन जाती है। सो रघुवरन के रास्‍ते में भी हज़ार चुनौतियां हैं। हालात कितने भी बदतर क्‍यों न हों... लेकिन रघुवरन बार-बार गिर कर भी खड़ा होता है। हर हालत में नायक सही और गलत में से सही रास्‍ते को ही पकड़ता है फिर चाहे इसकी कीमत मिट्टी में मिल जाना ही क्‍यों न हो। यही अंदाज़ रघुवरन को नायक बनाता है और फिर यहां तो नायक दक्षिण भारतीय फिल्‍म का है सो उससे उस सब की अपेक्षा भी की जाती है जो एक उत्‍तर भारतीय फिल्‍म के नायक के लिए लगभग असंभव हो। मसलन एक दुबला पतला छरहरा बदनगले में टाई बांधकर कम्‍प्‍यूटर पर काम करने वाला बाबूजी टाइप सिविल इंजीनियर जरूरत पड़ने पर अपने से तीन गुना भारी और भयंकर गुंडों को ताश के पत्‍तों की तरह हवा में उड़ा रहा है। एक पल को तो लगता है कि बॉसकुछ ज्‍यादा हो गया। पर अगले ही पल ख्‍याल आता है कि जैसे धनुष के कंधों पर शायद ग्रेट रजनीकांत की विरासत को संभालने की जिम्‍मेदारी आन पड़ी हो। यूं भी साउथ की फिल्‍में बिना मार-धाड़टशनबाजी और धूम-धड़ाके के पूरी हो ही नहीं सकतीं। तिस पर भी यह फिल्‍म मसालेदार मिक्‍स वेज की तरह तैयार की गई है। धनुष से जबरन डांसगाना और कॉमेडी कराई गई है। मगर कुछ है जो तमाम कमियों के बावजूद हमें बांधे रखता है।

एक दर्शक के तौर पर मेरी दिलचस्‍पी इस बात में है कि बार-बार तबाह होने वाला रघुवरन फीनिक्‍स की तरह कैसे अपनी ही राख से उठ खड़ा होगायूं तो इस तरह की कहानियां भारतीय सिनेमा में सैकड़ों फिल्‍मों में आजमाई जा चुकी हैं लेकिन यहां ट्रीटमेंट थोड़ा अलग है। अपने कमजोर पलों में भी नायक को सिम्पथी की जरूरत नहीं है बल्कि जीरो पर आ जाने के बाद उसमें ग़ज़ब की ताकत नज़र आने लगती है क्‍योंकि अब उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है। यही इसके नायक की यूएसपी है। धनुष बार-बार अपने ससुर रजनीकांत के स्टाइल की याद दिलाते हैं।

फिल्‍म में कई जगह सौंदर्या रजनीकांत का निर्देशन और धनुष की कहानी, दोनों लड़खड़ाते नज़र आते हैं। देश की सबसे बड़ी कंपनी की मालकिन वसुंधरा को बराबरी की टक्‍कर देने वाला रघुवरन हर रात अव्‍वल दर्जे के शराबियों की तरह पी कर घर लौटता है। फिर मियां-बीबी का रोज का वही घिसा-पिटा नाटक। बीवियों के नाम पर वही पुराने घिसे-पिटे चुटकुले। पूरी फिल्‍म को धनुष अपने कंधे पर उठा कर अंत तक ले गए हैं मगर वह दूसरों के कमजोर कंधों की जिम्‍मेदारी तो नहीं उठा सकते न?फिल्‍म का एक भी गीत याद रखने लायक नहीं है। फिल्‍म का अंत जरूरत से ज्‍यादा नौटंकी भरा है।

यह क्‍लास की नहीं बल्कि मास की फिल्‍म है। इसलिए यदि हॉल में नायक की टशनभरी स्‍टाइल देख कर ताली पीटना अच्‍छा लगता हो तो जरूर जाएं। बीच-बीच में कुछ धारदार डायलॉग भी तालियों की चाह में ही पिरोए गए लगते हैं और उन पर ताली बनती भी है। बेहतरीन डबिंग और काजोल की मौजूदगी से पता ही नहीं चलता कि ये कोई हिन्‍दी फिल्‍म न होकर तमिल फिल्‍म है। और हांफिल्‍म के अंतिम दृश्‍य में अपने संवाद ‘अब देखना मैं आगे-आगे क्‍या करता हूं’ के साथ धनुष ‘वीआईपी-3की भी गुंजाइश छोड़ गए हैं।


फिल्‍म वीआईपी-2 का यह रिव्‍यू मूल रूप से चर्चित  फिल्‍म पत्रकार और समीक्षक दीपक दुआ जी की वेबसाइट सिनेयात्रा के लिए लिखा गया था जो वहां 19 अगस्‍त को प्रकाशित हुआ है। उसी लेख को यहां यायावरी के पाठकों के लिए प्रकाशित किया गया है। 

Wednesday, 31 May 2017

Tirthan Valley: A Hidden Paradise in Himachal- Part 2

तीर्थन वैली: 
सफ़र एक सपनों की दुनिया का- भाग दो

दोस्‍तो, पिछली पोस्‍ट में आपने दिल्‍ली से तीर्थन वैली और फिर जालोरी-पास तक के सफ़र की कहानी पढ़ी. जो पिछली पोस्‍ट नहीं पढ़ पाए वे पहले Tirthan Valley: A Hidden Paradise in Himachal पढ़ें क्‍योंकि कहानी तो शुरू से सुनी जाती है. है ना?

तो आगे का किस्‍सा ये है कि जालोरी पास पर स्‍नो-फॉल के उस जादुई मंजर को अपने दिल में कैद कर हमारा काफिला वापिस एंगलर्स रिट्रीट की उसी छुपी-ढ़की दुनिया में लौट आया. हम एक बार फिर इंटरनेट और मोबाइल सिग्‍नल के दायरों से बाहर और बहुत दूर थे. इंटरनेट से दूर रहने की आदत नहीं थी सो पहले दिन बहुत अजीब लगा. हाथ बार-बार मोबाइल की स्‍क्रीन पर चला जाता मगर स्‍क्रीन में ऊपर सिग्‍नल-बार को नदारद पाकर मायूस होकर लौट आता. बार-बार लगता कि जैसे कोई मैसेज आया हो, किसी ने कुछ कहा हो या कुछ देखने-पढ़ने लायक भेजा हो. पूरा एक दिन लगा इस बेचैनी को दूर करने में. मगर एक बार जब ये बेचैनी दूर हो गई तो लगने लगा कि इंटरनेट की ये पुडि़या असल में है फालतू ही. अब हम जिस दुनिया में थे वहां वास्‍तव में इस सबकी कोई जरूरत नहीं थी. हम आए भी तो सुकून की तलाश में ही थे. कभी-कभी हमें इस बीमारी से दूर रहना भी चाहिए. सो इस वक्‍़त मोबाइल केवल एक कैमरे का काम कर रहा था.

जालोरी और खनाग तक की यात्रा में कुछ थकान भी हड्डियों में उतर आई थी. जिसे रिसॉर्ट की गर्म अदरक वाली चाय ने हल्‍का कर दिया. इसके बाद शुरू हुआ रात में बोन-फायर का दौर जो देर रात तक घुमक्‍कड़ों के किस्‍सों के साथ चलता रहा. ये रिसॉर्ट में हमारी आखिरी रात थी और अगले दिन सुबह वापिस उसी आपाधापी भरी सभ्‍यता की ओर लौटना था. यहां आते समय जिस गति से पांडे जी हमें लेकर आए उससे तय था कि यदि सुबह आठ-नौ बजे निकले तो आधी रात में दिल्‍ली में प्रवेश करेंगे और फिर रात 2-3 बजे के आस-पास दिल्‍ली में कहां भटकते? सो तय किया कि प्रस्‍थान अब आराम से किया जाएगा. इससे कुछ और घंटे हमें तीर्थन में मिल गए.



मगर तीर्थन छोड़ने से पहले इस यात्रा का एक अनूठा सोपान अभी बाकी था. एक शाम पहले चाय पर फ्रांस से आई हुई पॉलिन कैस से मुलाक़ात हुई. पॉलिन फ्रांस में योगा की स्‍टूडेंट हैं और यहां वर्कअवे साइट के जरिए आई हुई हैं. वर्कअवे दरअसल दुनिया भर के उत्‍साही लोगों को दुनिया में किसी जगह जाकर अपना मनपसंद काम करने और बदले में वहां रहने और खान-पान की मुफ्त व्‍यवस्‍था में होस्‍ट और वॉलंटियर के बीच मध्‍यस्‍थ की भूमिका निभाती है. आपके पास कोई खास हुनर हो या आप कोई काम जानते हों तो इस साइट पर वॉलंटियर करने के लिए रजिस्‍टर कर दीजिए फिर जिसे जरूरत होगी...आपको होस्‍ट कर देगा. आप किसी ग़रीब देश में बच्‍चों को पढ़ा सकते हैं, कंस्‍ट्रक्‍शन में मदद कर सकते हैं, किसी परिवार के साथ रह कर उनके बच्‍चों को गिटार सिखा सकते हैं, कोई नई भाषा सिखा सकते हैं, किसी ऑफ-बीट लोकेशन पर किसी छोटे रिसॉर्ट या रेस्‍तरां में कुकिंग कर सकते हैं, कुल मिलाकर आप जो कुछ जानते हैं उसकी कहीं न कहीं दरकार जरूर होगी...इसी तरह पॉलिन यहां योगा सिखा रही थीं. ये एक तरह का सांस्‍कृतिक आदान-प्रदान है. ये खेल समझ आया तो मैं सोचने लगा कि एक दिन मौका लगा तो जरूर कहीं वर्कअवे के सहारे ही निकल पडूंगा. अंग्रेजी-हिन्‍दी दोनों पढ़ा सकता हूं, थोड़ी बहुत कैरियर काउंसलिंग भी कर सकता हूं, स्‍कूल-कॉलेज में पब्लिक स्‍पीकिंग के कारगर गुर सिखा सकता हूं. खैर फिलहाल पॉलिन ने योगा सीखने के लिए आमंत्रित किया तो झट से हां कह दी. योगा के लिए सुबह 7 बजे का वक्‍़त तय किया गया. ये बात बाद में पता चली कि अल्‍का जी और पुनीत जी को इस व्‍यवस्‍था का पहले से पता था मगर इसे सरप्राइज के तौर पर सीक्रेट रखा गया था.


PC: दो घुमक्‍कड़

PC: Alka Kaushik
पॉलिन ध्‍यान की मुद्रा मेें
तस्‍वीर: तीर्थन एंंगलर्स रिट्रीट
अगले दिन सुबह ठीक 7 बजे मैं बाहर मैदान में था. आस-पास खामोशी और पलाचन के शोर के सिवाय कुछ नहीं था. जो साथी रात को योगा का वायदा करके गए थे शायद अभी नींद के आगोश में थे. तभी पॉलिन को पास के एक घर से साजो-सामान के साथ रिसॉर्ट की ओर आते देखा. इस वक्‍़त वैली मौसम का एक और ही रंग दिखा रही थी. जो इलाका पिछले दो दिन से बादलों और बारिश के खेल में डूबा था आज वो सुनहरी धूप में चमक रहा था. सूर्यदेव पहाड़ी के ऊपर आसमान में पूरे तेज के साथ मुस्‍कुरा रहे थे. इस वक्‍़त हवा की ताजगी को मापने का कोई पैमाना होता तो शायद टूट ही जाता. पॉलिन अपने साथ नए योगा मैट्स लेकर आई थीं. योगा करने वालों ने अपने कपड़ों से मैच करते कलर के मैट चुन लिए और शुरू हुआ सूर्य नमस्‍कार का एक शानदार सत्र. मैं काफी दिनों बाद योगा कर रहा था सो भूली हुई चीजों को पकड़ने में थोड़ी देर लगी. हर आसन के साथ एक बात समझ आ रही थी कि योगा एक दिन और काम हो गया वाली चीज नहीं है. इसका असल लाभ तभी मिलता है जब इसे जीवन में नियमित रूप से किया जाए. आज तो बस सीखना था...यहां से लौट कर कितना दोहरा पाऊंगा ये तो समय ही बताएगा. आधा घंटे के बाद शरीर का पुर्जा-पुर्जा खुल गया और फेंफड़ों में खूब ताजा हवा पहुंची तो इस योग का जादू समझ आया. विदेशी लोग हमारे योग के दीवाने होते जा रहे हैं और देसी लोग घर की मुर्गी दाल बराबर समझ कर योग को भूल ही चुके हैं. अच्‍छी बात है कि देश में अब धीरे-धीरे योग के प्रति जागरूकता बढ़ रही है. 
   
तस्‍वीर: दो घुमक्‍कड़
जाने से पहले रिसॉर्ट के मालिक दिलशेर से पूछ बैठा कि दुनिया के इस कौने में इतनी शानदार मेहमान-नवाजी में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है
? तो दिलशेर ने बताया कि कुछ दिक्‍क्‍तें तो आती हैं, मसलन हर चीज के लिए बंजार या गुशैणी के बाजारों पर निर्भर रहना पड़ता है. कभी-कभी रास्‍ता खराब होने की वजह से किसी चीज की सप्‍लाई नहीं हो पाती तो दिक्‍कत आती है. कभी-कभी गेस्‍ट किसी खास चीज की फरमाइश कर बैठते हैं जिसे पूरा करना संभव नहीं होता है. दिलशेर मुस्‍कुराते हुए कहते हैं कि वे अपनी तरफ़ से गेस्‍ट को सरप्राइज़ करने की पूरी कोशिश करते हैं, हां, किसी चीज का वायदा नहीं कर सकते. उनकी इस बात की गवाही पिछले दो दिनों का मेन्‍यू दे रहा था जिसमें बेहद स्‍वादिष्‍ट मगर घर जैसा खाना तमाम विविधताओं के साथ परोसा गया था. कुछ और समस्‍याएं दिलशेर के सामने आती हैं मगर उन्‍होंने उनका हल ढूंढ़ रखा है सिवाय मौसम की अड़चनों के. दिलशेर का मेहमान बनना भी अपने आप में काफी-कुछ सीखने और समझने का अवसर था. इंसान अगर जिंदादिल हो तो जंगल में भी मंगल कर सकता है. दिलशेर तीर्थन में वही कर रहे हैं.

अब योग भी हो चुका था और तकरीबन 11.30 बजे तक वापसी के लिए प्रस्‍थान भी. अब लगा कि यात्रा का किस्‍सा पूरा हो चुका है. अब सिर्फ वापसी ही होगी. मगर ये यात्रा हर कदम पर चौंका रही थी. अभी हमें नागिनी गांव में हिमाचल का प्रसिद्ध व्‍यंजन सिड्डू का भी जायका लेना था. हमारे ग्रुप में साथ चल रही मेधावी यहीं एक होमस्‍टे में रहती हैं. दुनिया घूमने और एक शांत जिंदगी की खोज में वे अपनी नौकरी और दीन-दुनिया को छोड़कर पिछले कई महीनों से यहीं आ बसी हैं. मेधावी ने हिमालय में तमाम शानदार ट्रैक किए हैं और अब तक उनकी एमएच12 नंबर की कार इस इलाके में उनकी पहचान बन चुकी है. सो होमस्‍टे की मालिक कविता जी ने हम सबके लिए सिड्डू तैयार किए हुए थे. सिड्डू दरअसल मैदा से बनने वाली डिश है जिसमें पिसे हुए ड्राई-फ्रूट और प्‍याज वगैरह से स्‍टफिंग की जाती है और इसे देसी घी और हरी चटनी के साथ खाया जाता है. साथ में गर्म चाय के कप ने इसके स्‍वाद को और बढ़ा दिया था. यहीं मुझे हाथ से बुने हुए खूबसूरत मोजे भी मिल गए. कुछ देर बिष्‍ट निवास से पास में बहती तीर्थन के निहारने के बाद मेधावी को अलविदा कहकर हम अपनी मंजिल दिल्‍ली की ओर लौट पड़े. किसी भी सफ़र से लौटते वक्‍़त हम असल में लौट ही कहां पाते हैं, हमारा मन जो पीछे रह जाता है. बस साथ चली आती हैं तो स्‍मृतियां...जो बार-बार उस दुनिया की ओर फिर से उड़ चलने का न्‍यौता देती रहती हैं. 


तस्‍वीर: दो घुमक्‍कड़



अलविदा....फिर मिलेंगे किसी और सफ़र पर. यायावरी पढ़ने के लिए अपना वक्‍़त देने का बहुत शुक्रिया. एक बार फिर  शुक्रिया TCBG का इस ख़ूबसूरत सफ़र के लिए.

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